रविवार, 17 अक्तूबर 2010

मिलन का यही स्थान

मिलन का यही स्थान तय तो हुआ था
सुनिश्चित दिवस और समय तो हुआ था.

नहीं हो सका उनसे परिणय तो क्या ग़म ?
ये क्या कम है उनसे प्रणय तो हुआ था.

रहा पूर्णतः मौन बाहर से लेकिन
वो निर्दय हृदय में सदय तो हुआ था.

ये क्यों बेसुरे स्वर उभरने लगे हैं ?
लयों का परस्पर विलय तो हुआ था.

बनायेंगे फिर नीड़ तिनके जुटा कर
यहाँ चक्रवाती प्रलय तो हुआ था.

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर रचना लगाई है आपने!
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आपके श्रम को नमन!
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असत्य पर सत्य की विजय के पावन पर्व
विजयादशमी की आपको और आपके परिवार को
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

अल्पना वर्मा ने कहा…

'बनायेंगे फिर नीड़ तिनके जुटा कर
यहाँ चक्रवाती प्रलय तो हुआ था.'
-रहा पूर्णतः मौन बाहर से लेकिन
वो निर्दय हृदय में सदय तो हुआ था.

-निराशा में आशा जगाती ..उदास मन को बहलाती ,ढाढस बंधाती यह रचना बहुत अच्छी लगी.

parshant ने कहा…

Sohbat-e-israt-e-khubaaN hi ganimat samjho,
Gar n hui umr-e-tabeei n sahi
GALIB

sukoon ने कहा…

"बनायेंगे फिर नीड़ तिनके जुटा कर
यहाँ चक्रवाती प्रलय तो हुआ था.."

निराशा से आशा को क्या ख़ूब तराशा है। बेहतरीन।