शनिवार, 10 अप्रैल 2010

बिजली क्या है, जादू है बस

बिजली क्या है, जादू है बस .

घुप्प अँधेरे में जब आँखें
बिलकुल बेबस हो जाती हैं
सारी चीज़ें काली चादर
के अन्दर जब खो जाती हैं

बल्ब जले तो मिट जाता है
आँखों का सारा असमंजस .

पंखा फ्रिज टीवी या मिक्सी
कूलर एसी या कम्प्यूटर
चलते हैं बिजली के बूते
आज दिखाई देते घर-घर .

हरफनमौला बिजली के बिन
नहीं हो सकेंगे टस से मस .

बिजली क्या है, जादू है बस .

5 टिप्‍पणियां:

अल्पना वर्मा ने कहा…

बिजली की अहमियत बताती बहुत ही अच्छी बाल कविता .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस जादू के तो सब ही दीवाने हैं!
सुन्दर कविता!

Dr. Chandra Kumar Jain ने कहा…

सरल....सही अभिव्यक्ति
=====================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Kabhi aise socha hi nahin!
Darasal bijli is taken for granted!
Good one!
Regards!

पी के शर्मा ने कहा…

वाह क्‍या खूब लिखा है
पसंद आया आपका ब्‍लाग