रविवार, 28 मार्च 2010

जिबह की शुरुआत

निर्मम हो जाने की हद तक
हँसना तुमसे हो पायेगा ?
हिंस्र और परपीड़क होने की सीमा तक
नाच सकोगे ?
कर पाओगे भावुकता का अभिनय,
जब आदेश मिलेगा ?

बदले सन्दर्भों में
सबसे ज़्यादा क्रूर और हिंसक तो
केवल मुस्कानें होती हैं .

ओ निष्कलुष स्वप्नजीवी !
तुम जान नहीं पाओगे-- कैसे
हँसते-गाते-मुस्काते
या मस्ती में नर्तन करते ही
पंख तुम्हारे धीरे-धीरे नुच जायेंगे .
तुम आभारस्वरूप ज़रा-सा
खिसिया कर रह जाओगे, बस !

जिबह किये जाने की जो
शुरुआत हो चुकी है
तुम उसमें
किस हैसियत से शामिल हो--
यह जान-समझ लो !

3 टिप्‍पणियां:

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता.
बदले सन्दर्भ ,बदलता वक़्त सब कुछ ही सीखा जाता है..भावनाओं को नाटकीय प्रदर्शन भी!!!!
जो निर्ममता की हद्द तक हंसना सीख लेगा उस के लिए भावुकता का अभिनय कठीन नहीं होगा.
'समय के साथ 'न चल सकने वाला hi सपनो में जीने लगता है..बदलता समय,बदलते सन्दर्भ और अनुकूलता की नयी परिभाषाएं..
इंसान को ही बदल रही हैं.

Amitraghat ने कहा…

बढ़िया रचना.........."

Prashant ने कहा…

good poem. this one has a lot of realism in it.