सोमवार, 9 जनवरी 2012

मुझे उस कविता की तलाश है

साठ के दशक में जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब हमारी हिन्दी की पुस्तक में थी वह कविता। आज मुझे उसकी पहली दो पंक्तियाँ ही याद हैं। शायद यह सामान्य-सी कविता ही रही होगी। पर आज मन चाहता है पूरी कविता पढ़ने को। जहां तक मुझे याद है, यह विख्यात छायावादी कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की रचना थी:
"जन-पर्व मकर-संक्रांति आज।
उमड़ा नहान को जन-समाज। ..."
आप में से किसी को यह कविता मिले, तो मुझे अवश्य उपलब्ध करवाएँ।
साथ ही, मैं यह महसूस कर रहा हूँ कि हमारा अपना साहित्य इंटरनेट पर आसानी से अब तक भी हम उपलब्ध नहीं करवा सके हैं। हमें इस विषय में अभी बहुत कुछ करना है। आपका क्या विचार है?

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

vandana ने कहा…

http://kv.nilambar.com/poem83/83829

उपर्युक्त लिंक पर यह कविता उपलब्ध है और कविता कोष पर भी

Dinesh Dadhichi ने कहा…

आभारी हूँ। मुझे हर्ष है कि यह कविता उपलब्ध है; मेरा यह अनुमान ग़लत निकला कि यह इंटरनेट पर नहीं है। आप सब को मकर-संक्रांति की शुभकामनायें।

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

हिन्दी साहित्य की लगभग सभी रचनाएँ नेट में उपलब्ध है । बस समय देकर उन्हें ढूँढना पड़ता है । आपको आपके पसन्द की रचना मिल गई,बधाई ।
मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

संगीता पुरी ने कहा…

नेट पर कविता मिल जाने के लिए बधाई .. अच्‍छी कविता याद दिलाने के लिए आपका आभार .. आपके इस पोस्‍ट से हमारी वार्ता समृद्ध हुई है .. आभार !!