सोमवार, 17 जून 2013

किसका करें भरोसा?

किसका करें भरोसा, मेरे भाई,
आखिर किसका करें भरोसा?

तरह-तरह के अखबारों को बाँच लिया करते हैं
आँखों देखी बातों को भी जाँच लिया करते हैं
सूप (छाज) की तरह झूठ छोड़ कर साँच लिया करते हैं
हम हीरे के धोखे में कब काँच लिया करते हैं?

लेकिन अब अखबारों ने भी मीठा ज़हर परोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

जादू का बक्सा भी लाया एक नयी रंगीनी
दिल दिमाग को ढकने वाली चादर जैसे झीनी
शामों की रौनक आपस की बातचीत भी छीनी
उसके कहने पर फीकी लगने लगती है चीनी

वह बोले, तो मीठा माना जाए गरम समोसा.
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

अपने जैसे बेशुमार हैं जग में जन साधारण
रहे खराबी से बचते, अच्छाई करते धारण
नहीं बने हम भाट किसी के चापलूस ना चारण
लेकिन हम पड़ गये अकेले चुप रहने का कारण

इस चुप्पी ने भी बीमारी को है पाला-पोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

अलग-अलग हैं हुए तजुर्बे, दुनिया देखी-भाली
पहले कुछ चीज़ें सफ़ेद थीं, कुछ होती थीं काली
अब थोड़ी-सी असली हैं, ज़्यादा चीज़ें हैं जाली
हंसों पर हँसते हैं कौए बैठे डाली-डाली

भला आदमी समझा जाता मिट्टी के माधो-सा
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

एहतियात के बावजूद खाएं धोखा, तो सोचें
अगर चाहते हैं फिर धोखे से बचना, तो सोचें
मुश्किल है, फिर भी मिल कर कोई रस्ता तो सोचें
जब भी मौका मिले फैसला करने का, तो सोचें

हमने अक्सर बाद में अपनी किस्मत को है कोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

3 टिप्‍पणियां:

Deepesh Bhardwaj ने कहा…

one of the master piece sir

Anjali Gupta ने कहा…

A true depiction of an ordinary man's painful dilemma in today's world!The projection of evil as good and imposition of of false over truth,that is the greatest tragedy of today's world leading to utmost confusion. No one has either the zeal or the tactic to reveal and follow the truth.The ordinary man simply remains a silent sufferer not knowing what to do and how.The helplessness and confusion of an ordinary man in the present ethos has been vividly and perfectly depicted.A remarkable poem!

htmLinking.com ने कहा…

nice
Hinduism