शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

मैं क्यों लिखता हूँ ? (पहला भाग)

कई बार हम यह मान बैठते हैं कि हमारे आसपास की चीज़ें और स्थितियां जैसी हैं वैसी की वैसी बनी रहें तो यह उचित भी है और सुविधाजनक भी। हम सोचने लगते हैं कि इसमें हर्ज़ भी क्या है ? क्या परेशानी है ? ऐसे में हम यह भूल जाते हैं कि इन चीज़ों और स्थितियों को अगर वैसे का वैसा छोड़ दें तो ये वैसी नहीं रहेंगी बल्कि ख़राब होने लगेंगी; इनमें विकृतियाँ, सड़न और दुर्गन्ध समा जाएंगे। हम स्वयं चीज़ें नहीं बल्कि सचेत, संवेदनशील, सोचने-समझने वाले इंसान हैं। हमारा हस्तक्षेप चीज़ों और स्थितियों को बेहतर बनाने एवं उनके सकारात्मक पक्षोंको बनाए रखने के लिए ज़रूरी है। यह निहायत ज़रूरी है कि हम हस्तक्षेप करें-- विचार से करें,चेतना के विस्तार से तथा ज़्यादा परिपक्व होकर। सारे मानव-समाज के लिए, स्वयं अपने लिए, अपने देश, नगर-गाँव और पूरे माहौलके लिए यह ज़रूरी है। अगर बदलाव की ज़रूरत ही महसूस हो और बदलाव होने का विश्वास ही हो, तो किसी भी तरह का सांस्कृतिक-रचनात्मक कर्म व्यर्थ हो जाएगा। कविता-कहानी लिखना मेरी दृष्टि में इसी तरह का एक सार्थक हस्तक्षेप है।

चाहे यह तय है कि अपने व्यक्तिगत-सामाजिक जीवन के यथार्थ से जुड़ा हुआ रचना-क्रम ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, फिर भी किसी--किसी स्वीकृत आदर्श या ऊँचाई की ओर प्रस्थान का उपक्रम कवि या लेखक की रचनाओं में मौजूद रहता है। बदलाव की जिस कोशिश का मैंने अभी ज़िक्र किया है, वह किन्हीं जीवन-मूल्यों और आदर्शों के सन्दर्भ में ही सार्थक हो सकती है। ये कोई बड़े, उदात्त, क्रन्तिकारी, रामबाण-तुल्य या चमत्कारपूर्ण आदर्श नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में अपनाए जाने लायक ऐसे दिशा-निदेशक स्वस्थ मूल्य हैं, जो अपने समाज की पूर्ववर्ती पीढ़ियों द्वारा इतिहास के लम्बे अरसे के दौरान विकसित किये गए हैं और परंपरा या विरासत के रूप में हमें आज उपलब्ध हें

ये मूल्य और आदर्श बेहद सीधे-सादे और सामान्य लगने के बावजूद आधारभूत हें और अत्यंत महत्त्वपूर्ण हें। जैसे सहिष्णुता और सहनशीलता दोनों ही बातें आज की स्थितियों में ज़्यादा ज़रूरी हो गयी हें। समाज में, परिवार में, देश में, संसार में अपने से इतर जो ' दूसरे' हैं, जिन्हें हम 'दूसरे' मानते रहते हैं, उनके प्रति स्वागत और खुलेपन का दृष्टिकोण, उनके लिए स्थान छोड़ने उनका ध्यान रखने की प्रवृत्ति -- इन बातों की आज ज़रुरत है। डर, असुरक्षा, बेचैनी, छीनाझपटी हो या किन्हीं अन्य भीतरी कमज़ोरियों अथवा बाहरी दबावों से उपजी आक्रामकता, असहिष्णुता, नफरत और वहशीपन हो-- इन सबसे निजात पाई जा सकती है। इसी विश्वास और आस्था की डोर से बांध कर कविता, कहानी, लेख अदि लिखना मुझे सार्थक ही नहीं, अनिवार्य लगने लगता है।


स्थितियों में बदलाव लाने के उद्देश्य से किया गया किसी भी तरह का हस्तक्षेप तब तक सार्थक नहीं हो सकता, जब तक उसके पीछे स्थितियों की ठीक-ठीक समझ भी काम कर रही हो। आज के माहौल में समस्या सिर्फ शोषण, अन्याय, अत्याचार आदि के स्थूल रूप से पहचाने जा सकने वाले विविध रूपों की ही नहीं है, बल्कि हमारी चेतना, जीवन-दृष्टि और संवेदना के विस्तार और गहराई के ख़िलाफ़ काम करने वाले उन सूक्ष्म दबावों तथा छिपे हुए कारकों की भी है, जो केवल हमारी चेतना को सीमित करते हें, बल्कि परोक्ष रूप में उसे विकृत भी करते रहते हें।ऐसे हालात में स्थितियों की ठीक-ठीक समझ बनाना और उनके पूरे परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रख पाना पहले से कहीं ज़्यादा दुष्कर हो गया है।


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