शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

मैं क्यों लिखता हूँ? (दूसरा भाग)

विगत दो दशकों में हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में कुछ ऐसे परिवर्तन आये हैं जिन्हों ने हमारी जीवन-शैली को प्रभावित करने के साथ-साथ हमारे दृष्टिकोण, मूल्यों, प्रवृत्तियों और चिंतन-पद्धतियों तक को बदल डाला है। पीढ़ियों के आपसी संपर्क-सूत्रों, पारिवारिक संबंधों तथा समूहों के आपसी समीकरणों में भी महत्त्वपूर्ण उलटफेर हो रहे हैं। परंपरा की हमारी अवधारणा और उसके प्रति हमारी दृष्टि भी अब पहले जैसी नहीं रही हैं। स्थूल परिवर्तनों का लेखा-जोखा तो तथ्यात्मक सूचना-स्रोतों से मिल जाता है, परन्तु मूल्यों और दृष्टियों में आ रहे सूक्ष्म परिवर्तनों के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का दुष्कर कार्य साहित्यकारों की ज़िम्मेदारी है। अपने समय की धड़कनों को सुन कर और जानी-अनजानी आंतरिक तथा बाहरी शक्तियों द्वारा परिचालित व्यक्तियों के विविध क्रिया-कलापों की सामूहिकता की नब्ज़ पर हाथ रख कर यह पहचानना कि वस्तुतः किस स्तर पर कहाँ क्या और क्यों हो रहा है --एक बहुत बड़ी चुनौती है।
हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में आज जो प्रवृत्तियां ज़ोर पकड़ रही हैं, उनके कारण स्वस्थ साहित्य की पहुँच निरंतर सीमित होती जा रही है। इसके बावजूद अभी हमारी जिजीविषा, जीवन - मूल्यों के प्रति आस्था और इंसानियत की गरिमा का अभी पूरी तरह क्षरण नहीं हुआ है। साहित्य का आधार अभी सुरक्षित है और जीवन को अधिक सुंदर तथा जीने योग्य बनाने की उसकी सामर्थ्य पर मुझे भरोसा है। बल्कि यह बात मेरे भीतर अटल विश्वास की तरह स्थापित है।
लेखन-कर्म जितना आनंद-दायक अनुभव है, लेखन के बाद पुस्तक के पाठकों तक पहुँचने की सारी प्रक्रिया, कम से कम हिन्दी-जगत में, उतना ही पीड़ादायक अनुभव है। किसी भी लेखक को साहित्य-क्षेत्र में बने रहने के लिए इस दुखद स्थिति को बार-बार झेलना ही होता है। चलिए, प्रकाशक तो, ख़ैर, व्यापारी होता है; समीक्षा तो व्यापार नहीं। परन्तु लगभग शत-प्रतिशत समीक्षा प्रायोजित होती है। क्या यह शर्मनाक स्थिति नहीं है?
हमें लेखक के रूप में पहचाना जाये या हमारी रचनाएँ पढ़ी और पसंद की जाएँ, तो यह हमें अक्सर किसी उपलब्धि जैसा प्रतीत होता है। एक मायने में यह सही भी है। पर मुझे यह एहसास होने लगा है कि साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों की व्यक्तिगत प्रतिभा के कायल होने के साथ-साथ हम अगर इन उपलब्धियों की सामूहिकता को समझें, उसे स्वीकार करें और उस पर जोर दें तो बेहतर होगा। वैसे देखा जाये तो जो हमारा मौलिक लेखन कहलाता है, वह हमारी व्यक्तिगत प्रतिभा की छाप के बावजूद बहुत हद तक हमें अपनी परंपरा, विरासत, अध्ययन, सामाजिक अनुभवों और सोचने-समझने की समाज से प्राप्त हुई पद्धतियों से ही निर्मित होता है।

1 टिप्पणी:

खामोशी के खिलाफ़.... ने कहा…

ये जानकर बहुत खुशी हुई कि आप लिखते क्यों हैं? क्योंकि आज बहुत कम लोग ये जानते हैं कि वे लिखते क्यों हैं? तेजी से बदलते वक़्त के साथ संवेदनाओं और चीजों के मूल को समझने का माद्दा आज कि पीढ़ी खोती जा रही है...जो चमक रहा है वही सोना है. और इनके लिए आसपास सब हराभरा है ....ना इन्हें कोई तकलीफ है ना कोई शिकायत....जुल्म और शोषण पर प्रतिरोध के स्वर के स्थान पर अजीब सी शिथिलता छा रही है....अच्छा है आप उन्हें जगा रहे हैं. उम्मीद है बर्फ जरुर पिघलेगी.