बुधवार, 20 जनवरी 2010

देखा-परखा खूब ...

देखा-परखा खूब, आजमाया है, कर ली जाँच
शिलाखंड-सा है अटूट अपने रिश्ते का काँच .

आसमान की रंगत ने उजियाला फैलाया
पेड़ों ने तब बिना छुए आँखों को सहलाया
अलसायी फागुनी हवा भी चली ककहरा बांच .
शिलाखंड-सा है अटूट...

मुग्ध हुआ मन नयी आहटों के अभिनन्दन में
नेह अजाने कोंपल जैसा फूट पड़ा मन में .
तभी नसों में जाग उठी थी धीमी-धीमी आंच .
शिलाखंड-सा है अटूट....

उलझे दूरी और निकटता के असमंजस में
कितना कुछ झेला, कह पाए कितना आपस में ?
कहा-सुना सब झूठ कि जो भोगा हमने वह साँच .
शिलाखंड-सा है अटूट....

पहले तो अस्थिर-सा था अपने रिश्ते का रूप
कभी शीत हिमपात मेह था कभी चमकती धूप
अब वसंत है, बीत गये हैं बाकी मौसम पाँच !
शिलाखंड-सा है अटूट.....

3 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

वाह !! वाह !! वाह !! अतिसुन्दर गीत...भाव शिल्प प्रवाहमयता ,सब कुछ ऐसी कि सहज ही मन मुग्ध कर ले...
आनंद आ गया पढ़कर...बहुत बहुत आभार...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

देखा-परखा खूब ...
देखा-परखा खूब, आजमाया है, कर ली जाँच
शिलाखंड-सा है अटूट अपने रिश्ते का काँच .

कविता में शब्दों के मोती करीने से पिरोए हैं आपने!

vandana yadav ने कहा…

hello sir...dis is awesome...can't believe an eng. proff. writes dis.. m first timer in terms of blog reading & after dis m sure going to be a regular one...sir plz do write something about campus...

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