शनिवार, 2 जनवरी 2010

नए वर्ष की वेला

क्यों अंतर्मन में इक उजास-सा लगता है
क्यों आज भली लगती है हर इक बात हमें ?
है और दिनों जैसा ही यह सुन्दर विहान
फिर क्यों विशेष लगता है यही प्रभात हमें ?

जिस बीते कल की उथल-पुथल से गुज़रे हैं
उसके सब सबक हमें रस्ता दिखलायेंगे ।
यह बात खास है नये वर्ष की वेला में
हम ज्यादा हिम्मत से अब कदम बढ़ाएँगे ।

हम नित्य नवीन दिशाओं का संधान करें
निर्भय हो कर अपने पथ पर बढ़ते जाएँ ।
हर सुन्दर सपना हो अंकुरित बने बिरवा
पल्लवित और पुष्पित हों मन की आशाएँ ।

सौभाग्य हमारा मार्ग प्रशस्त बनाएगा
जब नेक इरादों से मेहनत में रत होंगे ।
खुद अपना ही विवेक, साहस, विश्वास यहाँ
हर कठिनाई में हम सब की ताकत होंगे ।

आसान नहीं हैं चुनौतियाँ इस जीवन की
पर हमने सदा धैर्य से उन्हें हराया है ।
बस, यही स्मरण करवाने की खातिर शायद
इस नये वर्ष का सूरज यूं मुस्काया है !

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस नये वर्ष में आप हर्षित रहें,
ख्याति-यश में सदा आप चर्चित रहें।
मन के उपवन में महकें सुगन्धित सुमन,
राष्ट्र के यज्ञ में आप अर्पित रहें।।

Dinesh Dadhichi ने कहा…

संबंधों में मधु-रस का संचार किया है .
सुन्दर पावन मनभावन सन्देश दिया है .
शुभकामना हमारी भी स्वीकार कीजिये
आभारी हूँ, नए वर्ष में याद किया है .

Prashant ने कहा…

Happy New Year, Sir

अल्पना वर्मा ने कहा…

Nav varsh par ek bahut hi behtareen kavita!