सोमवार, 1 मार्च 2010

तस्वीरों के रोग बहुत हैं...

तस्वीरों के रोग बहुत हैं .

आँखें बँधुआ बन जाती हैं,
छिन जाती मन की आज़ादी,
तय हो जाती चिंतन-धारा,
उड़ते पाखी का ऊर्ध्वंग
वेग भी सीमित हो जाता है .
सुविधा-सी लगती है शायद
इसीलिये
पक्षधर बनें जो तस्वीरों के,
जग में ऐसे लोग बहुत हैं !
तस्वीरों के रोग बहुत हैं .

शब्द ज़रा मेहनत करने से ही
सधते हैं .
लेकिन हर कल्पना
खुले में
पा सकती विस्तार शब्द से .
शब्द मुक्ति के वाहक बनते,
चिंतन के निर्झर का वेग
बढ़ाने वाले,
वस्तु-जगत के चक्रव्यूह में
हमें सुझाते नए रास्ते.

इन पर तस्वीरों के
कसने लगे शिकंजे.
तस्वीरों की बहुतायत है .
किसी संक्रमण की शुरुआत
हुई जाती है !

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इन पर तस्वीरों के
कसने लगे शिकंजे.
तस्वीरों की बहुतायत है .
किसी संक्रमण की शुरुआत
हुई जाती है !

सुन्दर रचना!

अल्पना वर्मा ने कहा…

कल्पना को शब्द ही आकार देते हैं विस्तार देते हैं..
भावों की अभिव्यक्ति देते हैं...
उनकी महत्ता हमेशा बनी रहेगी..
तस्वीरों के पक्षधर कितने भी हों..अंत में जो सब से अच्छा है..वही टिकता है.
कविता में जहाँ एक और कटाक्ष नज़र आता है वहीं
कुछ विद्रोह भी..
बेहतरीन प्रस्तुति !

खामोशी के खिलाफ़.... ने कहा…

सर मुझे कविता-कहानी लिखना और फोटोग्राफी दोनों का शौक है ....मगर चित्र कभी भी शब्दों से नहीं जीत पाए. हाँ आज बाजार मैं चित्र जरुर शब्दों पर हावी होते नजर आते हैं. बहुत सुन्दरता से आपने शब्दों की व्यथा को शब्दों मैं ही बंधा है....चित्र कहाँ यह कह पाते?