रविवार, 21 मार्च 2010

कब्रिस्तान में बाज़ार

वीतरागी हो चला था मन .
कँगूरे सामने की भीत के
जर्जर दिखाई दे रहे थे .
वनस्पतियों, पेड़-पौधों औ' लताओं
से घिरी पगडंडियों पर
हर तरफ पसरा हुआ था
निपट खालीपन .
और ही कुछ लग रहा था
सृष्टि का फैलाव
बेतरतीब बेमानी .
'सच यही है अंततः' ---
दुहरा रहा था वीतरागी मन .
'खोखली हैं ये ख़रीद-फ़रोख्त की बातें
मुलाकातें
जिन्हें हम सच समझते हैं .'
बस यही सब सोचते-गुनते
अचानक
एक पत्थर पर लिखा देखा---
'फ़ुल बॉडी मसाज'
जिसके साथ ही फिर
साफ़ देखी जा रही थी
दस अंकों वाली इक संख्या .
यूँ उकेरी गयी मानो
पा गयी अमरत्व का वरदान !

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सटीक और सुधरा लेखन!

अल्पना वर्मा ने कहा…

भीड़ में अकेलेपन का अहसास और जहाँ सब कुछ बिकाऊ होने लगा है .उस दुनिया को यही कहेंगे..कब्रिस्तान में बाज़ार!
उत्कृष्ट रचना.