रविवार, 22 अगस्त 2010

दिन गये वे बीत

दिन गये वे बीत जब मैं बात कहता था खरी.
अब मेरे शब्दों की नोकें हो गयी हैं भोथरी .

देखने-सुनने का मतलब आजकल
दिक्कतों और मुश्किलों से उलझना .
कटघरे में जब खड़ा होगा कहीं
क्या अकेला कर सकेगा इक चना?

नज़र है धुँधला गयी तो लाभ है
सभी जिम्मेदारियों से हूँ बरी .

सच छिपाने के तरीके सैकड़ों
इस ज़माने की नयी ईजाद हैं .
सभी लज्जाजनक स्थितियों के लिए
शब्द सुविधाजनक मुझको याद हैं.

जाल को अनुशासनात्मक कह रहा
मछलियों को कह रहा हूँ जलपरी.

साफगोई का मज़ा, फिर भी, सुनो,
खास ही कुछ स्वाद होता है सदा.
खुल के बातें बोलने वाला तभी
बड़ी मीठी नींद सोता है सदा.

नया नुस्खा---नींद मीठी के लिए
लाभप्रद होती हैं बातें चरपरी.

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

साफगोई का मज़ा, फिर भी, सुनो,
खास ही कुछ स्वाद होता है सदा.
खुल के बातें बोलने वाला तभी
बड़ी मीठी नींद सोता है सदा.

नया नुस्खा---नींद मीठी के लिए
लाभप्रद होती हैं बातें चरपरी.
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नये बिम्बों से सजी हुई
सुन्दर रचना के लिए बधाई!

Mahima Singh ने कहा…

namaste uncle,

is kavita ko padh ke abhaas hota hai ki KAVITA mein naveenta ka koi annt nahin hai..kavita ki yeh shaili kaafi rochak hai... aur sabse khaas baat ki yeh kavita aaj ki paristhitiyon mein shayad har insaan ke jeevan se seedha sambandh rakhti hai....