बुधवार, 5 अगस्त 2009

घटती जाती दिन-दिन ताकत जेबों की

घटती जाती दिन-दिन ताकत जेबों की ।

घर पर आती नहीं टोकरी सेबों की ।

लगता है महँगाई हमसे लेगी छीन

चाकलेट, टॉफी, बिस्किट मीठे नमकीन ।

आइसक्रीम खाना भी कम हो जाएगा ।

फीका गरमी का मौसम हो जाएगा ।

नहीं खिलौने मिल पायेंगे मनचाहे ।

सपनों पर भी अंकुश होंगे अनचाहे ।

एक-एक करके होती जायेंगी बंद

वे चीज़ें जो बच्चों को हैं बड़ी पसंद ।

यही सोच कर है अपना माथा ठनका

क्या होगा भगवान हमारे बचपन का ?

3 टिप्‍पणियां:

Dinesh Sharma ने कहा…

दिनेश जी
आप अच्छा लिखते हैं ,इसमें कोई सन्देह नहीं ।
हाँ,आपको यहां देखकर बहुत अच्छा लगा। साधुवाद!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

जब बच्चे ये सोचने लगेंगे वे इस दुनिया को बदल देंगे।

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!
शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणीकारों को असुविधा न होगी।

poonam ने कहा…

apki kavita me jo bachpan ke pal, unki masoomiat khone ka dar hai wo jeb ki taakat kam hone se hai...apki kavita ne ek shok sa paida kar dia man me..." kya mere bachche wo masoomiat, wo prakriti se atoot naata, wo insaani rishton ki ahmiat us gahnta se samajh payenge jis shiddat se humne unhe apne dilon me sanjoya hai....."