सोमवार, 24 अगस्त 2009

बादल की छाँव

कभी चमकती धूप कभी यह बोझीले बादल की छाँव ।
लिपट गयी है पल भर को मुझसे गीले बादल की छाँव ।

बारिश आयी, सांझ ढले यह गाती हुई बयार चली--
"अगर शेष है प्यास अभी, पी ले पीले बादल की छाँव " ।

उड़ता हुआ वायुमंडल में अस्थिर है अस्तित्व मेरा
जैसे किसी उदास, शून्य-से, दर्दीले बादल की छाँव ।

जीने के उपकरण सभी हैं-- फूल, चाँदनी, नील गगन,
ये पहाड़, ये नदियाँ, झरने, ये टीले, बादल की छाँव ।

आती है, तो सारा जग बदला-बदला-सा लगता है,
याद तुम्हारी कहूँ इसे या सपनीले बादल की छाँव ?

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस सुन्दर रचना के लिए बधाई!

Syed Ali Hamid ने कहा…

I like the Hindi ghazals of Dushyant Kumar. You deserve praise for handling the ghazal well in Hindi.