गुरुवार, 5 नवंबर 2009

सत्रह हज़ार बधाइयाँ

खेल हो कठिन जिस दिन पिच साथ न दे
'लूज़' को बदल देता 'विन' में, कमाल है ।
गिन-गिन रन लेते रहने के बावजूद
हारने लगे जो टीम, लेता वो सँभाल है ।
गेंद चाहे तेज़ चाहे 'स्पिन' हो, लेकिन उसे
नहले पे दहला लगाना तत्काल है ।
बात तो ज़रूर कोई उसकी क्रिकेट में है
तभी तो सचिन बिन गलती न दाल है ।

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर!
बधाई हो जी!

Rajender, jind ने कहा…

ye kavita sone par suhage ka kam karti hai. abhi abhi sachin ne 200 runs ki innings kheli hai, us par ye kavita. aisa lagta hai mano kavi ko pahale se hi iska aabhash tha.agar kavi aapka teacher bhi raha ho to aanand doguna ho jata hai.