सोमवार, 30 नवंबर 2009

वे खुश हुए

बाड़ बन कर रौंद डाला खेत, तब वे खुश हुए ।
खा गयी हरियालियाँ सब रेत, तब वे खुश हुए ।
मार कर कुल्हाड़ियाँ स्वयमेव अपने पाँव पर
बन गया इन्सान जिंदा प्रेत, तब वे खुश हुए ।

5 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार ने कहा…

अर्थपूर्ण रचना

ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक ने कहा…

बन गया जिन्दा प्रेत , तब वे बहुत खुश हुऐ
........बहुत सतीक कहा है......!!!

ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक ने कहा…

बहुत सटीक कहा है....!(उक्त टिप्पणि में गलती से सतीक लिखा गया है)

aamin ने कहा…

सटीक

comment ke liye word verification hata le to behter hoga... kisi ko comment karne me dikkat nhi hogi

sandeep sharma ने कहा…

मज़ा आ गया सरकार...