शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

चेहरों का माहिया

माहिया पंजाब की एक लोक-विधा है । इसके छंद का प्रयोग करते हुए आधुनिक भाव-बोध को व्यक्त करने का यह एक छोटा-सा प्रयास है :
चेहरे प्रतिमाओं के ।
छंद हैं ये पत्थर पर
लिक्खी कविताओं के ।

चेहरे पर दो आँखें ।
उड़ते बनपाखी की
फैली हुई हैं पाँखें ।

चेहरे क्यों उतर गये ?
दांत दुश्चिंता के
भीतर तक कुतर गये ।

चेहरे की लकीरों में ।
दर्द रेखांकित है
बूढी तस्वीरों में ।

चेहरों में परिवर्तन ।
होगा फिर नाटक का
इक और खुला मंचन ।

चेहरे भ्रमजाल बने ।
ये कभी नारायण
कभी नर-कंकाल बने ।

चेहरों का जंगल है ।
घना कुहरा है कभी
कभी छाया हुआ बादल है ।

चेहरे फिर सख्त हुए ।
प्यार विकलांग हुआ
रिश्ते हैं दरख़्त हुए ।

चेहरों की एल्बम है ।
खाली इक पृष्ठ पड़ा
कि अधूरी सरगम है ।

8 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति।बधाई।

आमीन ने कहा…

so so so good
no more words to say.
thanks

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत ही सुन्दर छन्दों का प्रयोग किया ही।

अल्पना वर्मा ने कहा…

चेहरों में परिवर्तन ।
होगा फिर नाटक का
इक और खुला मंचन ।

waah!
बहुत ही अच्छी रचना.

सुजान कवि ने कहा…

चेहरों पर उत्तम रचना लिखी है सर आपने
खूब बधाईयाँ

सूबे सिहं सुजान ने कहा…

मुझे आज ज्ञात हुआ कि आपने बहुत रचनायें इन्टरनेट पर डाल रखी हैं

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 17/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Swati Vallabha Raj ने कहा…

इस भाव में माहिया नहीं पढ़ा था..बहुत हीं सुन्दर...आभार....