रविवार, 19 जनवरी 2014

देखता रह गया.......

क्या हुआ यकबयक, देखता रह गया.
मैं उसे देर तक देखता रह गया.

उनका चेहरा उठा आसमाँ की तरफ़
चाँद भी एकटक देखता रह गया.

खुल गयी नींद, सपना न टूटे कहीं
बंद करके पलक देखता रह गया.

हो गया मैं बरी फिर भी देखो उसे
मुझपे इतना था शक, देखता रह गया.

हक जता के तू खुशियाँ चुराता रहा
जिसका था उनपे हक, देखता रह गया.

मेरा दुश्मन मिला जब मुझे प्यार से

क्या सिखाता सबक? देखता रह गया

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-01-2014) को चर्चा कथा में चर्चाकथा "अद्भुत आनन्दमयी बेला" (चर्चा मंच अंक-1498) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'