मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

असली बात

असली बात तो इन्सानी तकलीफ़ों की है ।
तकलीफ़ों की सूरत, देखो,
कैसी मिलती-जुलती-सी है ।
जैसी तेरे आसपास हैं
वैसी ही दुखदायी स्थितियाँ
मुझको कर जाती उदास हैं ।
यूँ ही अकेला कर जाती हैं
हम सब को पीड़ाएं
लेकिन
यह भी क्या संताप नहीं है ?
दुख-दर्दों में टूट-टूट कर
अलग पड़े रहना ही
आख़िर क्यों हमको लाजिम लगता है ?
जुड़ भी तो सकते हैं हम-तुम
उन दुख-दर्दों में फँस कर
जो साँझे हैं, मिलते-जुलते हैं ।
मुमकिन है, तकलीफें फिर भी
ख़त्म नहीं हों ।
पर मुमकिन है
उनको ख़त्म किए जाने की
कोई राह निकल ही आए !

असली बात नहीं
दुख-दर्दों तकलीफ़ों की;
असली बात हमारे
दुख में मिल-जुल कर
रहने की भी है !

2 टिप्‍पणियां:

MANOJ KUMAR ने कहा…

असली बात हमारे
दुख में मिल-जुल कर
रहने की भी है !
निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

असली बात सबको अच्छी लगती है।
मुझे भी बहुत अच्छी लगी।
बधाई!