शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

तुम नहीं हो पास

फिर फुहारें लौट आयी हैं मेरी दहलीज़ पर
फिर हवाएँ दे रही हैं दस्तकें इस द्वार पर
फिर फ़ज़ाओं में घुली हैं गंध माटी की, मगर--

तुम नहीं हो पास तो सब व्यर्थ हैं ।

गुनगुनाती छेड़ती बूँदें टपकती हैं इधर
पेड़ सारे सरसराते ही रहे हैं रात भर
बिजलियों ने गगन के ऊपर किये हस्ताक्षर

इस लिखावट का भला क्या अर्थ हैं ?

4 टिप्‍पणियां:

मीत ने कहा…

सही है ..

ओम आर्य ने कहा…

bahut bahut sahi hai...

Dinesh Dadhichi ने कहा…

shukriya

Syed Ali Hamid ने कहा…

The question at the end gives the poem its punch. I am reminded of a couplet(I can't recall the name of the poet):

सैय्याद बात इतनी सी मद्देनज़र रहे
बिजली कहाँ गिरेगी मेरे आशियाँ के बाद ?