शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

शेष कुशल है

चिट्ठी में बस यही ख़बर लिक्खी केवल है , शेष कुशल है ।

खेत जहाँ थे वहां दूर तक जल-ही-जल है, शेष कुशल है ।

कैसे हैं आसार न पूछो, कब पहुंचेंगे पार, न पूछो

जर्जर नौका, टूटे चप्पू , मांझी शल है, शेष कुशल है ।

सुनते हैं कल रात दस्तकों से दरवाज़े काँप उठे थे

बंद गाँव के हर दरवाज़े की साँकल है, शेष कुशल है ।

पलक झपकते बीत गए हैं बरस कभी ऐसा लगता था

अब अक्सर बरसों जैसा लगता इक पल है, शेष कुशल है ।

4 टिप्‍पणियां:

poonam ने कहा…

Beautiful....kis saralta se sare zammaane ki vyatha , har shakhs ke man ka haal kah dia apne is saral, magar man ko jhinjhodne wali kavita me...

पथिक.... ने कहा…

waah.. bahut khoob

sukoon ने कहा…

सुनते हैं कल रात दस्तकों से दरवाज़े काँप उठे थे

बंद गाँव के हर दरवाज़े की साँकल है, शेष कुशल है ।

पलक झपकते बीत गए हैं बरस कभी ऐसा लगता था

अब अक्सर बरसों जैसा लगता इक पल है, शेष कुशल है ।




बहुत खूब सर। इतने सरल शब्दों में , इतनी गहरी बातें कहना हर किसी के बस की बात नहीं है।आपसे बहुत कुछ सीखना होगा।लिखते रहिये..।

geeta verma ने कहा…

लाजवाब ग़ज़ल है सर....
बेहद सुन्दर....
असमर्थ हूँ उन शब्दों के चयन में जो इतनी खूबसूरत ग़ज़ल की प्रसंशा कर सकें....
बस प्रसन्न हूँ पढ़कर....और बार बार पढ़े जा रही हूँ.....