सोमवार, 6 जुलाई 2009

काली औरत ने....

काली औरत ने यह लड़की सौ परदों के पार जनी ।

कैसी सुन्दर भोर हुई है निथरी-सुथरी छनी-छनी


दूर-दूर तक पेड़ नहीं, बादल का कहीं निशान था

थका मुसाफ़िर मरुस्थलों में ढूँढ रहा था छाँव घनी .


फिर से आज उड़ान भरेगी मोम-परों वाली चिड़िया

फिर से वहशी हाथ करेंगे उसके घर में आगज़नी .


नन्हे खरगोशों के रोयेंदार जिस्म ज़ख्मी कर के

कितनी धन्य हो गयी है तलवार तुम्हारी रक्तसनी .


जब भी मैं गुलाब की पंखुडियों की बातें करता हूँ,

लोगों की आँखों में अक्सर उग आती है नागफनी .

6 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

जीवन के सौन्दर्य से भरपूर कविता के लिए बधाई!
और ये शब्द पुष्टिकरण हटाएँ। यह टिप्पणी शत्रु है।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर कविता.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

rochak
sundar
umda kavita................
hardik abhinandan !

M VERMA ने कहा…

जब भी मैं गुलाब की पंखुडियों की बातें करता हूँ,
लोगों की आँखों में अक्सर उग आती है नागफनी .
यही सच है
बहुत सुन्दर ----

Mahima Singh ने कहा…

vaah!! jeevan ke saaraansh aur aaj ke yug ki sachchaaiyon ka varnan karti yeh kavita bahut hi khoob hai...vichitrata yeh hai ki jeevan ki hi taraha yeh kavita jitni saral maaloom padti hai utne hi gehre iske arth hain....hum jaise yuva kaviyon ke liye aap ek prerna srot hain....

Dinesh Dadhichi ने कहा…

prerak tippaniyon ke liye aap sab ka aabhaari hoon.