बुधवार, 4 मार्च 2009

अपराधी

पार्क में पेड़ प्रतीक्षा कर रहे हैं और पौधे बालकों की तरह ठुनक रहे हैं। इन दिनों पेड़ पौधों को तीखी भूख लगने से पूर्व ही, पूर्व दिशा से उभर कर आने वाली सुनहरी थाली सामने जाती है। फिर भी उन्हें आहार की प्रतीक्षा तो रहती है। इधर निकुंज बाबू अपने घर से निकल पड़े हैं। सुबह सवेरे घर के भीतर बैठे रहने से उन्हें भी पौधों जैसी ही बेचैनी होने लगती है। उन्हें अपने बीच पा कर पेड़- पौधे आश्वस्त होते हैं। उनका आहार उन्हें मिलता है तो वे खिलखिलाते हैंइन दिनों यानि मार्च-अप्रैल में वे खूब खिलखिलाते हैं। निकुंज बाबू अपने नितांत निजी संसार में पहुंचे हैं। गिलहरियाँ, चिड़ियाँ, तोते, गुलाब, गेंदा और ऐसे अनेक फूल और परिंदे जिनके नाम उन्हें मालूम नहीं हैं - इन सब के बीच इन के साथ अपने विशेष रिश्ते का एहसास उनका भी संबल है। उसी तरह जैसे बालकों-से ठुनकने वाले पौधों को रोज़ सुबह उनका इंतजार रहता है।
निकुंज बाबू के दिन की इस शुरुआत से ऐसा समझें कि यह वरिष्ठ नागरिक दुनिया की सच्चाइयों से बेखबर रहता होगा। बल्कि उनकी दिनचर्या का अगला कदम अख़बार पढ़ना ही है। बहरहाल, अप्रैल के जिस दिन का हम ज़िक्र कर रहे हैं, वह और दिनों कि अपेक्षा कुछ ज़्यादा ही यादें लेकर आया है। उस ज़माने की यादें जब उनकी ज़िन्दगी घटनाओं और एक्शन से भरपूर थी। अब यह भी उन्हें याद नहीं रहा कि स्मृतियों की इस बरसात की पहली बूँद ने कैसे उन्हें छुआ था। दिमाग़ पर थोड़ा ज़ोर दे कर सोचा तो उन्हें याद आया कि अख़बार पर तारीख पढ़ते हुए उनकी यादों में जीवन के वसंत का वह दिन लौट आया जब वे स्कूल में पढ़ते थे। उनकी कक्षा में गरिमा नाम की एक लड़की थी, जिसका नाम बताने का वैसे कोई मतलब नहीं, क्योंकि इस नाम से उन्होंने उसे कभी बुलाया ही नहीं। वे तो हमेशा उसे 'मोटी' ही पुकारते थे। ऐसे नामों के लिए कोई तर्क हो भी सकता है, पर अक्सर ये यूँ ही व्यक्तित्व को परिभाषित-सा करने वाले चिढ़ाने के निश्चित तरीके के रूप में इस्तेमाल होते हैं। गरिमा इस नाम से ख़ास तौर पर इसीलिए चिढ़ती भी थी।
एक बार उसने निकुंज से एक किताब मांग कर ली। तीन दिन बाद जब पुस्तक वापस आयी, तो भीतर के मुखपृष्ठ पर छपे हुए कुछ अक्षरों के नीचे पेंसिल से लिखी कुछ संख्याओं पर निकुंज की नज़र पड़ी। एक से चौदह तक। यह कोई संकेत या संदेश था। संख्याओं के क्रम से उसने अक्षरों को जोड़ा। संदेश अंग्रेज़ी में धन्यवाद का था, यानी टी-एच--एन-के-एस-टी--एन-आई-के-यू-एन-जे, 'निकुंज को धन्यवाद' इसके लगभग दो सप्ताह बाद की बात है। निकुंज ने नोट-बुक में एक पृष्ठ खोल कर गरिमा की ओर वह नोट-बुक बढाई। "क्या है?" उसने पूछा। "ख़ुद देख लो। आज मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा के लिए एक नया रोचक खेल लाया हूँ।" गरिमा ने देखा - सामने पृष्ठ पर कुछ खाली वर्गाकार आकृतियाँ कतार में बनी हुई थीं और उन रिक्त स्थानों के ऊपर अलग-अलग संख्याएँ लिखी हुई थीं---१६-१८--१२--१५-१५-१२। तर्कहीन, बिना किसी क्रम के। निकुंज ने अनुभव किया कि थोडी उत्सुकता जाग रही है, तो आगे बोला, " इन रिक्त स्थानों को भर सको, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं तुम्हें क्या बनाना चाहता हूँ।" फिर दो क्षण रुक कर बोला, " तुम्हारी मदद के लिए एक संकेत दूं?" इस तरह चुनौती के बाद प्रलोभन भी प्रस्तुत कर दिया। कुछ देर सोचने के बाद गरिमा ने पूछा, " हाँ, बताओ। बस, संकेत करना; उत्तर मत बताना।" " देखो, इसका तरीका कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा तुमने मेरी इंग्लिश की रीडर के टाइटल पेज पर अपनाया था।" फिर थोड़ा रुक कर उसने जोड़ा, " मैंने तो एकदम इसका उत्तर खोज लिया था।" गरिमा को चिढाने के लिए इतना काफी था। आज निकुंज इतना सचेत था कि उसे 'मोटी' कह कर बुलाने से बच रहा था। लेकिन इस बात पर गरिमा का ध्यान ही नहीं गया। पेंसिल लेकर वह खाली स्थान भरने में जुट गई। तरीका सीधा-सादा था--'एक' के लिए '', 'दो' के लिए 'बी', 'तीन' के लिए 'सी' और इसी तरह 'छब्बीस' के लिए 'ज़ेड' इस तरह अक्षर भरने थे। इस बीच निकुंज ने कहा कि इन वर्गों को क्रम से भरना ज़रूरी नहीं है, तो गरिमा का काम और भी आसान हो गया। लेकिन एक बार सारे अक्षर भरने के बाद उसने जो पढ़ा, तो -पी-आर-आई-एल-ऍफ़---एल यानी 'april fool' पढ़ते ही वह उसी पेंसिल को हथियार बना कर निकुंज की ओर लपकी, लेकिन वह 'मोटी', 'मोटी' कह कर उसे चिढ़ाता हुआ भागा ज़्यादा दूर नहीं, क्योंकि पीछे मुड़ कर उसे गरिमा का गुस्से से भरा चेहरा, हंसी और नाराज़गी के मिले-जुले भाव व्यक्त करती उसकी आँखें भी तो देखनी थीं।
बात तो छोटी-सी थी, पर निकुंज को उन आँखों में गुस्सा कुछ ज्यादा और हंसी बहुत थोड़ी दिखाई दी। फिर उसने निकुंज को कुछ ऐसा कह दिया, जिसे वह आज तक भूल नहीं पाया है। " यही बनाओगे तुम मुझे! और तुमसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है ?" यूँ कहा गया, मानो अपने आप से कहा हो। इसके बाद वह पांच-छः रातों तक ठीक से सो नहीं पाया था। गरिमा की आँखों का वह अचानक बुझा-बुझा भाव और उसकी वह निराशापूर्ण आत्मालाप जैसी टिप्पणी उसके मन को कई दिनों तक पल-पल सालते रहे।
इससे पहले भी एक बार खेल-खेल में उसने कुछ बच्चों के साथ मिल कर एक योजना बनाई थी। दरअसल, रोहित को कचरे के ढेर में लोहे का एक खोल मिला था, जिसके आगे लेंस लगा था। संभवतः किसी वाहन के आगे रोशनी के लिए बनाया गया होगा। बच्चों ने उसे अपनी कल्पना से कैमरा मान लिया। फिर निकुंज ने योजना बनाई, जिसके अनुसार गरिमा को बुला कर वह जादू का कैमरा दिखाया गया। थोड़ी-सी कोशिश से निकुंज ने उसे फोटो खिंचवाने के लिए तैयार कर लिया। वह कुर्सी पर बैठी और रोहित अपने 'कैमरे' के साथ उसके सामने छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। निकुंज कुर्सी के पीछे था और तीन-चार लड़के-लड़कियां जादू का खेल देखने के लिए मौजूद थे। कैमरे में कुछ क्षण झाँकने के बाद योजना के अनुसार रोहित ने कहा, " गरिमा, तुम ज़रा एक बार खड़ी हो जाओ और कैमरे के लेंस पर नज़र टिकाये रखो। " गरिमा ने निर्देश का पालन किया। " ठीक है," रोहित बोला, " अब तुम इसी तरह लेंस पर नज़र टिकाये हुए बैठ जाओ।" ज्यों ही गरिमा ने बैठना चाहा, धड़ाम से फर्श पर गिरी, क्योंकि कुर्सी निकुंज ने पीछे से चुपचाप खिसका ली थी। फिर तो 'मोटी', 'मोटी' का शोर हुआ और बच्चों ने हँस-हँस कर इस तमाशे का खूब आनंद लिया। उस दिन भी गरिमा ने गुस्से से आँखें तरेर कर निकुंज को देखा था। हँसते-हँसते अचानक वह चुप-सा हो गया था। उन आँखों के दर्द और अपमान के भावों ने उसे तीन-चार रातों तक सोने नहीं दिया
'एप्रिल फूल' वाली घटना के बाद एक और छोटी-सी घटना हुई थी, जो पहले वाली घटनाओं की तरह योजनाबद्ध नहीं थी, बल्कि अचानक हो गयी थी। स्कूल में वार्षिक समारोह की तैयारी पूरी हो चुकी थी और कार्यक्रम की अंतिम रिहर्सल प्राचार्य के सामने प्रस्तुत करने के लिए सब बच्चे तैयार थे। नीली फ्राक और सफ़ेद ब्लाउज में गरिमा खुश थी। टीचर से अनुमति लेकर वह पानी पीने नल की ओर गयी, तो वहां निकुंज खड़ा था। जैसा बच्चे अक्सर करते हैं, पानी पीकर गरिमा ने पानी के छींटे उसके कपडों पर डाल दिए। निकुंज के हाथ में एक फाउंटेन पेन था, जो उसे दो दिन पहले ही उपहार में मिला थाउसने आव देखा ताव, तुंरत प्रतिशोध के लिए नीली स्याही के छींटे गरिमा के कपड़ों पर डाल दिए। बाद में टीचर के बार-बार पूछने और डांटने पर भी उसने निकुंज का नाम नहीं बताया था। पर उसकी आँखों में जो खामोशी और पीड़ा का भाव था, वह इतना मर्मस्पर्शी था कि निकुंज उन आँखों के बिम्ब को महीनों तक मन से हटा नहीं पाया था। उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। उस दिन के बाद उसने कभी गरिमा को 'मोटी' नहीं कहा। कहता भी तो कैसे ? गरिमा ने तो उसके बाद उससे कभी बात ही नहीं की।
उस दिन को याद कर के निकुंज बाबू की आँखें सजल हो आयीं। यह अचरज की बात थी। इस घटना को आधी सदी से भी ज्यादा अरसा हो गया था। अगर वह किसी को यह सब सुनाएँ, तो आज उनकी आँखों का सजल होना कोरी भावुकता ही कहलायेगा। पर उनके मन में चुभे हुए कांटे की-सी यह पीड़ा पुरानी पड़ती ही नहीं।
निकुंज बाबू के हाथ में अख़बार अभी तक यूं ही था। इसी पर अप्रैल की तिथि पढने के बाद वे यादों में खो गए थे। अपने आप को ज़रा सँभाल कर उन्होंने अख़बार की ख़बरों पर सायास ध्यान केन्द्रित करना चाहा। तीसरे पृष्ठ पर एक समाचार ने बरबस उनका ध्यान आकृष्ट किया। किसी युवती को राह चलते रोक कर एक युवक ने उसके चेहरे और कपड़ों पर तेजाब डालने का प्रयास किया था। निकुंज बाबू सोच में डूब गए। स्याही और तेजाब में फ़र्क होता है, लेकिन फ़र्क सिर्फ पीड़ा, नुकसान या अपमान का ही नहीं होता। वह तो सब की समझ में ही जाता है। एक और बहुत महीन अंतर भी होता है। कोरी भावुकता से बच कर रहना एक स्थिति है और निहायत संवेदनहीन हो जाना दूसरी स्थिति। व्यवहार में हम दोनों का अंतर नहीं बनाये रख सकते हैं। हमें देखना चाहिए कि हम सजल आँखों वाली भावुकता से बचे रहने की सावधानी में अनजाने ही भीतर से बिलकुल निर्मम और संवेदनारहित तो नहीं होते जा रहे हैं। निकुंज बाबू उस अपराधी युवक की बात फिलहाल नहीं सोच रहे हैं, जिसे अपराधी के रूप में पहचान लिया गया है। वे तो हमारे-आपके जैसे उन लोगों की बात सोच रहे हैं, जो अख़बार से मिली इस सूचना को ग्रहण करेंगे और किसी भी तरह की भावुकता से बच कर रहेंगे।

5 टिप्‍पणियां:

jyoti ने कहा…

wonderful story.....dil ko chhoo jaane vaali.......keep it up sir....we expect lots n lots from u..

mahima ने कहा…

uncle yeh bahut hi khoobsurat kahaani hai...kuchch expressions to behadd rachanaatmak hain...sabse achchi baat yeh hai ki kahaani ki bhaasha aur jazbaat bahut hi sahaj phir bhi bahut prabhaavshaali hain....khaas taur pe syaahi aur tezaab ki jo tulna aapne ki hai aur usse bhaavnatmakta ka varnan kiya hai us ehsaas ka bayaan shabdon mein nahin kiya ja sakta.
uncle please blog pe kuchch aur achchi kahaaniyan post kijiye....

बेनामी ने कहा…

स्याही और तेज़ाब में फर्क होता है...! सच में...राजबीर देसवाल

Anjali Gupta ने कहा…

वास्तव में ही संवेदनहीनता एवं संवेदनशीलता में बहुत महीन अंतर है। किसी अपने के वस्त्रों पर अनजाने में फेंकी गई स्याही भी वर्षो बाद आँखों में नमी लाने की ताकत रखती है , क्योंकि अपनों के लिए हम संवेदनशील हैं। किसी अनजान के चेहरे पर जानबूझ कर फेंका गया तेज़ाब भी हमें क्षण भर से अधिक विचलित नहीं कर पाता। हम संवेदनहीन हो जाते हैं। कोरी भावुकता लगती है अपरिचित के लिए आँखें नम करना। जो संवेदना अपनों के लिए रखते हैं हम यदि उसका अंश भर भी दूसरों के लिए रखें तो समाज कुछ बेहतर हो जाए। शब्दों के माध्यम से प्रकृति एवं मानव के बीच मूक समन्वय का चित्रण एवं बचपन की स्मृतियों में खो जाने को चित्रवत रूप में प्रस्तुत किया गया है। ऐसी ही विचारोत्प्रेरक एवं हृदयस्पर्शी कथाओं की आवश्यकता है समाज को।

Dinesh Dadhichi ने कहा…

अंजलि गुप्ता जी, आपकी सटीक एवं परिपक्व टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ. कृपया अन्य रचनाओं पर भी अपनी राय से अवगत कराएँ.