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सोमवार, 7 जुलाई 2014

जैसे घिरते बादल ...

शीतलता की सिहरन ऐसे
भरता मुझमें रूप तुम्हारा

                   जैसे घिरते बादल नभ के छोर

सावन की रातों-सी काली
आँखों में दो-चार सितारे

                   मस्ती से भर जाते उनके कोर

सुनी कहीं से मोर की बोली
उठ कर तुमने खिड़की खोली
मिल कर गले पवन-पाहुन से
बरबस अपनी देह भिगो ली

                  झूम उठा फिर तन का हर इक पोर

लगा तभी संकोच पिघलने
सपने मन में लगे मचलने
बौछारों की सुखद छुअन से
बेबस किया हमें बादल ने

                 भूल गए सब, हो कर प्रेम-विभोर 

मंगलवार, 3 जून 2014

हो गया हूँ अजनबी

हो गया हूँ अजनबी मैं आज अपने आप से
डर रहा हूँ क्यों अकारण आंतरिक संताप से?

पानियों में बादलों के बिंब सा हिलता हुआ
कुनमुनाते हुए पिल्ले की तरह चलता हुआ
गर्म चमकीला हठीला दिन गया है बीत
व्यस्तताओं से भरा सा मन गया है रीत
पर नहीं है मुक्त अब भी व्यस्तता की छाप से
हो गया हूँ अजनबी मैं आज अपने आप से.

मन मेरा बच्चे-सा मिट्टी धूल में लिपटा रहा
हाथ गंदे कर के अपने घर को वापिस आ रहा
गगन लगता खाँसती बीमार बुढ़िया-सा
दूर तक भीतर कहीं फैला कुहासा-सा
काँप कर हूँ रह गया इक अजनबी पदचाप से
हो गया हूँ अजनबी मैं आज अपने आप से.

साँस की गाड़ी बहुत भारी कि खींचूँ किस तरह?
जड़ें सूखी हैं; इन्हें आँसू से सींचूं किस तरह?
सभी कुछ तो साँस के ही लिए भुगता है 
सभी कुछ के प्रति हृदय में रोष उगता है 

पर तभी कुछ याद कर दिल भर गया अनुताप से.
हो गया हूँ अजनबी मैं आज अपने आप से.

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

रूठे बच्चे से दो बातें

कमरा चाहे जितना भी बड़ा हो,
उसकी छत आसमान तो नहीं होती.
अलबत्ता कमरे की खिड़की में
आसमान का कोई टुकड़ा-भर हो सकता है .

वैसे आसमान को देखना
उसमें उड़ान भरने जैसा बिलकुल नहीं होता
लेकिन आसमान को देखना
बिस्तर पर लेट कर
कमरे की दीवार को देखने से तो
बेहतर होता है.

(शामिल होने से खामोश इनकार करती
तुम्हारी पीठ के साथ मेरा संवाद
किसी नए लहजे की तलाश में है.)

अच्छा, बूझो,
वो क्या चीज़ है,
जो छत या दीवार में नहीं,
सिर्फ़ आकाश में है?

रविवार, 12 जनवरी 2014

पिछले एक सौ बीस मिनट में.....

एक पुरानी रचना है यह. लगभग २७ वर्ष पुरानी.

पिछले एक सौ बीस मिनट में, मेरे आक़ा!
समाचार है नहीं किसी अप्रिय घटना का.

हिंसा आगज़नी गड़बड़ की सारी ख़बरें
झूठी अफवाहें हैं ये अखबारी ख़बरें 
हम खुद पर्चे छाप-छाप कर बटवाएंगे 
नहीं छापते ये अखबार हमारी ख़बरें 

हम खींचेंगे खुशहाली का असली खाका.

देश तरक्क़ी पर है लेकिन गाफिल जनता
नहीं आपकी कृपा-दृष्टि के काबिल जनता
सच पूछें तो समझ नहीं पायी है अब तक
आपका ये एहसान, बड़ी है जाहिल जनता

तभी आपके शासन में भी करती फाका.

क्यों हुज़ूर चिंतित हैं इन लोगों की खातिर?
मंत्रीगण अफसर हैं किन लोगों की खातिर?
इनका सुख-दुःख आप भला क्यों पूछ रहे हैं?
हम अर्पित हैं सारा दिन लोगों की खातिर.

भला-बुरा हम खूब समझते हैं जनता का.

प्यास? लीजिये, इस गिलास में फ्रूट-जूस है.
शोर? किसानों का शायद कोई जुलूस है.
नहीं महल की शान्ति भंग होने देंगे हम,
उन सब के स्वागत की खातिर कारतूस है.

खूब सुरक्षित महल, बंद है हर इक नाका!

रंग-बिरंगे चित्रित विज्ञापन के ज़रिये
नाटक नृत्य गीत कविता के फन के ज़रिये
छा जायेंगे लोगों के दिल औ' दिमाग पर
हमीं रेडियो और दूरदर्शन के ज़रिये.

फहराएगी तभी आपकी कीर्ति-पताका.

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

सपनों को सिद्धांत समझ कर ....

सपनों को सिद्धांत समझ कर अड़ने की तकलीफ़ भी है
बुने हुए सपनों के पुनः उधड़ने की तकलीफ़ भी है.

उपवन में बेमौसम पत्ते झड़ने की तकलीफ़ भी है
और पेड़ पर लगे फलों के सड़ने की तकलीफ़ भी है.

बात अधूरी रह जाने का ही मन में अफ़सोस नहीं
लगातार सीने में काँटा गड़ने की तकलीफ़ भी है.

दिन भर दर्दनाक स्थितियों की उलझन से भिड़ने के बाद
रात उसी उलझन से कविता घड़ने की तकलीफ़ भी है.

बहुत बचा कर रक्खा मन का मनभावन माणिक अनमोल
उसके किन्हीं ग़लत हाथों में पड़ने की तकलीफ़ भी है.

बाहर के तूफ़ानों से तो जैसे-तैसे बच जाएँ
भीतर के खालीपन से खुद लड़ने की तकलीफ़ भी है.

दुख-दर्दों को सहने की तो बात अलग है जीवन में
उनका असली कारण ठीक पकड़ने की तकलीफ़ भी है.



शनिवार, 9 नवंबर 2013

असली बात

असली बात तो इनसानी तकलीफों की है .

तकलीफों की सूरत, देखो,
कैसी मिलती-जुलती सी है .
जैसी तेरे आसपास हैं
वैसी ही दुखदायी स्थितियां
मुझको कर जाती उदास हैं .
यूँ ही अकेला कर जाती है
हम सब को पीड़ाएं, लेकिन
यह भी क्या संताप नहीं है?
दुःख-दर्दों में टूट-टूट कर
अलग पड़े रहना ही आखिर
क्यों हमको लाज़िम लगता है?
जुड़ भी तो सकते हैं हम-तुम
उन दुःख-दर्दों में फंस कर
जो सांझे हैं, मिलते-जुलते हैं .

मुमकिन है, तकलीफें फिर भी
ख़त्म नहीं हों।
पर मुमकिन है
उनको ख़त्म किये जाने की
कोई राह निकल ही आये।

असली बात नहीं
दुःख-दर्दों, तकलीफों की,
असली बात हमारे
दुःख में मिल-जुल कर रहने की भी है!

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

तौलिया बोला ...

एक झकाझक साफ़-सुथरा तौलिया शो-रूम से निकला और बाथ-रूम में नहीं पहुंचा. बल्कि वह यकबयक ऐसी हालत में देखा गया कि पानी-पानी हो गया. ऐसा लगा मानो खुद को ढकने के लिए कोई तौलिया ढूँढ रहा हो.

हुआ यूँ कि टीवी चैनलों के बीसियों कैमरों की चुंधियाती रोशनियाँ उस पर पड़ रही थीं और किसी जघन्य अपराध करने वाले का चेहरा उस तौलिए से ढाँप कर अदालत में ले जाया जा रहा था. ऐसे में तौलिया बोल उठा:

तौलिया बोला -- "सभी के काम आता हूँ.
ढाँपता हूँ, पोंछता हूँ, मैं सुखाता हूँ.
सोचने का काम तो इन्सान करता है;
सोचना उसका मुझे हैरान करता है.

इतनी हलचल हडबडाहट किसलिए आखिर?
कैमरों की चौंधियाहट किसलिए आखिर?
मैं भी हूँ पतलून कोई, कोट शर्ट कमीज़?
देखिये, कुछ सोचिये, मैं तौलिया नाचीज़!

यूँ अदालत में न ले कर जाइए मुझको.
कम-से-कम कुछ काम तो बतलाइये मुझको.
कौन-सा मुझको करिश्मा कर दिखाना है?
फैसला कीजे, मुझे किस काम आना है?

ढाँप कर चेहरे कभी थकता नहीं हूँ मैं,
कारनामे पोंछ, पर, सकता नहीं हूँ मैं!"

सोमवार, 17 जून 2013

किसका करें भरोसा?

किसका करें भरोसा, मेरे भाई,
आखिर किसका करें भरोसा?

तरह-तरह के अखबारों को बाँच लिया करते हैं
आँखों देखी बातों को भी जाँच लिया करते हैं
सूप (छाज) की तरह झूठ छोड़ कर साँच लिया करते हैं
हम हीरे के धोखे में कब काँच लिया करते हैं?

लेकिन अब अखबारों ने भी मीठा ज़हर परोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

जादू का बक्सा भी लाया एक नयी रंगीनी
दिल दिमाग को ढकने वाली चादर जैसे झीनी
शामों की रौनक आपस की बातचीत भी छीनी
उसके कहने पर फीकी लगने लगती है चीनी

वह बोले, तो मीठा माना जाए गरम समोसा.
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

अपने जैसे बेशुमार हैं जग में जन साधारण
रहे खराबी से बचते, अच्छाई करते धारण
नहीं बने हम भाट किसी के चापलूस ना चारण
लेकिन हम पड़ गये अकेले चुप रहने का कारण

इस चुप्पी ने भी बीमारी को है पाला-पोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

अलग-अलग हैं हुए तजुर्बे, दुनिया देखी-भाली
पहले कुछ चीज़ें सफ़ेद थीं, कुछ होती थीं काली
अब थोड़ी-सी असली हैं, ज़्यादा चीज़ें हैं जाली
हंसों पर हँसते हैं कौए बैठे डाली-डाली

भला आदमी समझा जाता मिट्टी के माधो-सा
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

एहतियात के बावजूद खाएं धोखा, तो सोचें
अगर चाहते हैं फिर धोखे से बचना, तो सोचें
मुश्किल है, फिर भी मिल कर कोई रस्ता तो सोचें
जब भी मौका मिले फैसला करने का, तो सोचें

हमने अक्सर बाद में अपनी किस्मत को है कोसा!
मेरे भाई, आखिर किसका करें भरोसा?

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

लौटते मज़दूरों का बयान

17 मई 1988 की रात को पंजाब में रोपड़ के निकट एस वाई एल नहर के निर्माण में लगे इकतीस मजदूरों की आतंकवादियों द्वारा हत्या के बाद शेष मज़दूर बिहार आदि अपने प्रान्तों को लौटने लगे. इस प्रकार के समाचारों से प्रेरित थी यह कविता!

हम तो आये थे बाबूजी, लिंक नहर बनवाने को
बहता देखा खून, हुए मजबूर लौट कर जाने को.

आँधी थी कल रात, अँधेरा भी था गहरा-गहरा-सा
शोर हवाएँ करती थीं, पर आसमान था बहरा-सा
वक्त थम गया हो जैसे, हर पल लगता था ठहरा-सा
आप सुबह से मुर्दों पर देते हैं कैसा पहरा-सा?

ज़ख़्मी या मुर्दे तो पहुँचे नहीं रपट लिखवाने को.

सोच समझ कर आते हैं वहशी हमलावर, बिलकुल ठीक
वो फैलाना चाह रहे हैं लोगों में डर, बिलकुल ठीक
नहीं बचाया जा सकता हर गाँव या शहर, बिलकुल ठीक
हमें बचाना आपके बूते से है बाहर, बिलकुल ठीक

क्या ऐसी ही बातें अब रहती हैं हमें बताने को?

अगर नहर चालू होगी बंदूकों की निगरानी में
लहू बहेगा तीस जवाँ मज़दूरों का उस पानी में
मज़दूरों का ज़िक्र न होगा लेकिन किसी कहानी में
वो तो जान गँवा बैठे अनजाने में, नादानी में

मगर अभी तक जान बची है अपने पास बचाने को.

सोचा था कट जायं दलिद्दर, करने दूर कलेस चले
लेकिन किस्मत के आगे इंसानों की कब पेस चले?
किस से हो फ़रियाद भला अब किसके ऊपर केस चले?
फिर सामान बाँध कर आखिर अपने-अपने देस चले.

फिर से बीवी-बच्चे अब तरसेंगे दाने-दाने को.

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

शुक्र है .....

शुक्र है कि बच्चे अभी लड़ते हैं
वे खूब गुस्सा करते हैं
आपस में ही नहीं, माँ-बाप से भी
दूसरों से ही नहीं, अपने आप से भी
उन्हें गुस्सा आता है
अंदर से निकलता है,
चेहरे पर बिखर जाता है
आँखों में, हाथों में
साफ़ दिख जाता है.

कितनी खुशी की बात है
कि हमारे नन्हे-मुन्ने
नहीं होते हमारी तरह
समझौता-परस्त
शातिर, काइयाँ और घुन्ने!

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

अपनी अलिखित कविता के नाम

ओ मेरी अलिखित कविते!
अनिश्चित है तुम्हारा रूप, पर संभावनाएँ अनगिनत हैं.

शब्द, भाषा, छंद के बंधन नहीं तुम पर,
कि तुमने कागज़ों की खुरदरी, मैली, कंटीली-सी ज़मीनों पर
नहीं रक्खे हैं अपने पाँव अब तक,

नहीं तुम जानतीं
उड़ते हुए, स्वच्छंद, बन्धनहीन भावों को
पकड़ कर पंक्तियों में खड़ा करना
और उनको बाँधना
दुस्साध्य है कितना,

कि कैसे कुछ अमूर्त, अनाम-से अनुभाव
हो विक्षिप्त
अपने लिए जा कर खोजते
अपनी सही पहचान,
कि कैसे अनकहा, अव्यक्त रह जाता
सदा वह एक ही कथनीय,

कि कितने कटु कटाक्ष
प्रतिक्रिया के रूप में आ कर
तुम्हारे स्वत्व पर, अस्तित्व पर
उछालेंगे अतर्कित प्रश्न --
"क्यों हो तुम?"

कि वे ही लोग जो अपने विषय में
इस तरह के प्रश्न का उत्तर नहीं थे दे सके अब तक,
वही अब प्रश्न पूछेंगे!

नहीं मैं चाहता सचमुच
कि तुम अलिखित रहो, अनजान, दुनिया से अपरिचित,
परिधियों के पक्षधर हम सब यहाँ पर,
और फिर यूँ भी
तुम्हें आकार देने की
इस आदिम विवशता का
मैं बहुत सम्मान करता हूँ!

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

परदेसी की पाती

दीपावली का पर्व अपने प्रियजनों, पत्नी और बच्चों के साथ मनाया जाता है. पर कोई-कोई परदेसी किसी मजबूरी के चलते दीवाली पर भी अपने घर नहीं लौट पता. ऐसे समय में वह अपनी पत्नी के नाम क्या सन्देश देता है? प्रस्तुत है कविता:

अब की बार भला तुम कैसी दीपावली मनाओगी?
साँझ ढले कल छत के ऊपर दीप जलाने जाओगी?

सकुचाई-सी कुछ-कुछ ठंडी हवा तुम्हें दुलराने को
केश तुम्हारे चूम-चूम कर मेरी याद दिलाने को
कानों में कुछ कह दे तो क्या मुस्का कर शरमाओगी?

एक दीप नन्हा-सा तुम देहरी के पास सजा देना
बच्चों को सुन्दर फुलझडियाँ और मिठाई ला देना
तुम मजबूरी समझ गयीं पर उनको क्या समझाओगी?

काले नभ के नीचे घर पर दीपों का पहरा होगा
ज्योति-पर्व की रात अकेलापन कितना गहरा होगा
बच्चे तो सो जायेंगे, पर तुम कैसे सो पाओगी?
अब की बार भला तुम कैसी दीपावली मनाओगी?

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बरसों पहले की चाँदनी

यह कविता मैंने कॉलिज के दिनों में लिखी थी. आज एक पुरानी डायरी में मिल गयी. 'जैसी है, जहाँ है' आधार पर आप के लिए प्रस्तुत है :

फैली हुई चाँदनी में ये मैली-सी परछाइयाँ
बिखर गयी हैं मौन झील के वक्षःस्थल पर काइयाँ
मस्त झूमते पत्तों के सर-सर स्वर से भी, देखो तो --
अनजानी-सी खड़ी हुई हैं यहाँ वहाँ अमराइयाँ .

अटक-अटक कर पत्तों में से उतर रही है चाँदनी
खेतों में, आँगन में आ कर बिखर गयी है चाँदनी
लटक-लटक कर टहनी पर से, भटक-भटक कर आयी है,
है कोई शर्माती दुल्हिन, अरे, नहीं है चाँदनी .

दूर-दूर तक फीके तारे धुंधले-से हैं जड़े हुए
उधर क्षितिज के पास कहीं पर पेड़ एक-दो खड़े हुए,
मेरे आँगन की मुंडेर से सटी चाँदनी झाँक रही,
नीचे गोरे-से उजास के दो टुकड़े हैं पड़े हुए.

चाँद अकेला घूम रहा है और हवा बहती जाती
चुप-चुप पानी के बहाव को आ कर कुछ कहती जाती
यादों के घावों को भी यह छेड़-छेड़ कर जाती है,
आगे बढती नहीं ज़िंदगी है पीछे रहती जाती

सरक-सरक कर खिड़की से भीतर आती है चाँदनी
चुप रहती, फिर भी लगता है कुछ गाती है चाँदनी
सिरहाने मेरे आ कर सकुचाई-सी है बैठ गयी
कभी-कभी ऐसे भी मुझको ललचाती है चाँदनी.

नहीं चाँदनी, शिशु के अंतर्मन का कोमल भाव है,
नहीं चाँदनी, यह प्रेमी का पहला-पहला चाव है ,
पिघल-पिघल कर अंतरिक्ष से प्यार अछूता टपक रहा
हृदय जिसे दुलराया करता, वह मीठा-सा घाव है.

अति पवित्र कोमल मन की स्वप्निल नारी है चाँदनी
है कोमल, पर कब कठोरता से हारी है चाँदनी?
सभी दिशाएँ गहरे चिंतन में खोई-सी लगती हैं,
गहरे चिंतन की आकुलता-सी प्यारी है चाँदनी.

क्यों न आज सब ओर पड़े इस निर्मल दर्पण में झांकें?
क्यों न इसी सुंदरता की आँखों में हम डालें आँखें?
बस, थोड़ी-सी देर दिखाई देगी ऐसी चाँदनी,
जैसे दूर गगन पर उड़ते जाते पंछी की पांखें!

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

यह सब कैसे होता है ?

तुम जानते हो---- यह सब कैसे होता है?
कैसे भीड़ पहली बार
ऐसी घटना से उत्तेजित होती है
विरोध में नारे लगते हैं
जुलूस निकलते हैं.
घटना फिर होती है ---
इस बार शिष्ट-मंडल जुटते हैं
बहसें-चर्चाएं होती हैं.
घटना एक बार फिर होती है
किसी और स्थान पर
किसी और समय पर
थोड़े-से परिवर्तन के साथ.
अब की बार, कॉफी की चुस्कियों के साथ
बुद्धिजीवी उसके बारे में बात करते हैं.
अखबार में सुर्ख़ियों से उतर कर
वह छोटे-छोटे कालमों में
सिकुड जाती है
और इस तरह प्रतिक्रियाएं
ठंडी पड़ने लगती हैं
उत्तेजना मरने लगती है
उस पर बासीपन की परतें जमती जाती हैं.
हम यह कहना छोड़ देते हैं
कि अमुक घटना सनसनीखेज
या खतरनाक है .
या कि अमुक स्थिति
बड़ी शर्मनाक है.
आहिस्ता-आहिस्ता हमें
‘अन्याय’ को ‘न्याय’ कहना
ज़्यादा मुनासिब लगने लगता है.
हमारी तर्क करने की पद्धति बदल जाती है.
हम पूछते हैं—‘ठीक है, ऐसा हुआ.
पर क्या यह भ्रष्टाचार है?’
हत्या को हम आत्महत्या मान लेते हैं
या उससे भी आगे बढ़ कर
महज़ दुर्घटना.
आदर्शों पर बहस करने वाली
पीढ़ी तो बुढा गयी.
अब तो उन पर हँसने वाली पीढ़ी
आ चुकी है.
पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम स्वयं
अपना अवमूल्यन करते जा रहे हैं.
नामालूम ढंग से
चुपचाप, आहिस्ता-आहिस्ता.
इस खौफनाक प्रक्रिया को देख रहे हो तुम?
आक्रोश विस्मय अफ़सोस
रोमांच करुणा सरोकार
ये सब कैसे बर्फ़ की मानिंद
जमते चले जाते हैं
माहौल के शून्य डिग्री तापमान वाले
इस आत्मघाती ठंडेपन में?
तुम जानते हो--- यह सब कैसे होता है?

रविवार, 25 सितंबर 2011

चिटकनी

ऐसा अक्सर होता है
तुम्हें कमरे में बैठे-बैठे घुटन-सी महसूस होती है
और तुम उठ कर
खिड़की की चिटकनी खोल देते हो
तुम्हारा समूचा अस्तित्व
बाहर को छिटका-सा पड़ता है
तुम बाहर की हवाओं के प्रति
भिक्षा-पात्र बन जाते हो.

कभी-कभी कोई झोंका भी आता है
बाहरी हवाओं के नंगेपन की छुअन-सा
रोमांचक
उसे तुम पहचानते हो
दीवानावार गलियों में आवाजें/ दस्तकें देते हुए
ताजगी बांटते हुए उसे
कई बार तुमने देखा है.

तुम्हारा तन-मन हाथों की तरह फैलता है.
झोंका निःस्पृह संपन्न लापरवाह-सा
ताजगी धर कर हथेली पर तुम्हारी
चला जाता है.

पर तभी तुम्हारी नज़र
पड़ती है कमरे के फर्श पर सोफे पर टेबल पर
धूल के बारीक-से कण
झोंके के साथ आ कर बिछ गये हैं.
चिटकनी की ओर फिर से हाथ बढ़ता है अचानक
मौसम के साथ तुम्हारे थोड़े-से संपर्क को
वह जोड़ने का तोड़ने का एक माध्यम----चिटकनी
तुम्हारे कवच का वह एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा
हवाओं के खुलेपन
और मौसम के नंगेपन के प्रति
तुम्हारी संस्कारगत असहमति का
वह मौन-मूक प्रतीक चिटकनी
अब बंद होती है.

धूल के कण फर्श पर बिछ जायं
तो वह किरकिरी बर्दाश्त कर पाते नहीं हो
घुटन को अपनी नियति ही मान कर तुम
खिड़कियों को बंद रखते हो
धूल चुभती है तुम्हें
घुटन, पर, चुभती नहीं
महसूस होती है फक़त !

सोमवार, 6 जून 2011

रक्तबीज हिंसा के सैलाब में

इस रक्तबीज हिंसा के सैलाब में
डूबते-उतराते
तेज़ी से विस्मृत होते जाते
शब्दों के बीच
मानव-सभ्यता के सारे अवशेष
पूरी तरह मिट जाएँ ---
इस से पहले
शब्दों के बीज अगर
रखने हैं सुरक्षित तो
एक ही तरीका है ---
कविताएँ
कविताएँ
कविताएँ !

रविवार, 29 अगस्त 2010

एक दृश्य एक एहसास: तादात्म्य

साँस लेता हुआ-सा वातावरण
अनजाने, अनदेखे, निःस्वर
मेरी साँसों में घुल-मिल कर
होता एकाकार ?
अथवा
मैं ही धीरे-धीरे
मिट-मिट कर
इस दृश्य-फलक पर
बनता जाता हूँ संसार ?

रविवार, 22 अगस्त 2010

दिन गये वे बीत

दिन गये वे बीत जब मैं बात कहता था खरी.
अब मेरे शब्दों की नोकें हो गयी हैं भोथरी .

देखने-सुनने का मतलब आजकल
दिक्कतों और मुश्किलों से उलझना .
कटघरे में जब खड़ा होगा कहीं
क्या अकेला कर सकेगा इक चना?

नज़र है धुँधला गयी तो लाभ है
सभी जिम्मेदारियों से हूँ बरी .

सच छिपाने के तरीके सैकड़ों
इस ज़माने की नयी ईजाद हैं .
सभी लज्जाजनक स्थितियों के लिए
शब्द सुविधाजनक मुझको याद हैं.

जाल को अनुशासनात्मक कह रहा
मछलियों को कह रहा हूँ जलपरी.

साफगोई का मज़ा, फिर भी, सुनो,
खास ही कुछ स्वाद होता है सदा.
खुल के बातें बोलने वाला तभी
बड़ी मीठी नींद सोता है सदा.

नया नुस्खा---नींद मीठी के लिए
लाभप्रद होती हैं बातें चरपरी.

सोमवार, 16 अगस्त 2010

एक और काव्यानुवाद---वेंडी बार्कर की कविता का

Wendy Barker

The Pool

Small fish break the surface
but always I am waiting
for the deep-rooted lily
to bloom again, planted
so down in my silt.




वेंडी बार्कर
सरोवर

तोड़ती हैं सतह को बस मछलियाँ छोटी
जबकि मुझको है प्रतीक्षा सदा
केवल कुमुदिनी की
हैं जड़ें गहरी
खिलेगी फिर
उगेगी खूब गहरे पंक में से.
पंक जो मेरे तले में है.

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

वेंडी बार्कर की अंग्रेजी कविता का काव्यानुवाद

Wendy Barker

Eve Remembers

It was his bending to the path I noticed.
A deliberate dip, a sweep of his long arm.
Blind, we couldn’t know what lay ahead.
He said he was picking up twigs, branches,
trying to clear the path. He didn’t want
anyone who had to follow us to fall.




काव्यानुवाद
वेंडी बार्कर

याद है हव्वा को

मैंने तो बस उसका झुकना भर
देखा पथ पर
देखा—वह कुछ सोच-समझ कर झुका
और फैलायी लंबी बाँह.
दृष्टिहीन हम नहीं जान पाए
आगे की राह.
उसने कहा --- हटा देता हूँ
टूटी हुई टहनियाँ / पथ
काँटों से घिर जाए ना.
कहीं हमारे पीछे आने वाला
गिर जाए ना !