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रविवार, 26 अगस्त 2012

भूख है, तो सब्र कर .....

 
 
"भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ?
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे-बहस ये मुद्दआ !"

दुष्यंत भाई, आपको शिकायत थी कि मुद्दे केवल बहस तक सीमित रह जाते हैं.
 
हमने तो वह काम कर दिया है कि 'न रहेगा बांस, न बजेगी बाँसुरी.' कुछ भी ज़ेरे-बहस नहीं! दूर हो गयी आपकी शिकायत?
 
अब स्थिति आपके ही एक अन्य शे'र तक जा पहुँची है:
 
"यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा!"

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

मरीचिका

रेलगाड़ी अभी नहीं आयी थी । उमस बढती जा रही थी । गरमी में पसीने की चिपचिपाहट से सबके बदन भीग गए थे । कितने ही होंठ पपडाए हुए थे । लोहे की जाली वाली खिड़की के ऊपर तीन भाषाओँ में लिखा था-- 'शीतल जल' । खिड़की के सामने लोगों को पंक्तिबद्ध रखने के लिए मज़बूत पाइप लगे थे ।
पानी नहीं मिल रहा था । लोग शिकायत के लहजे में बातें कर रहे थे । एक युवक दो बार स्टेशन मास्टर के कमरे में झाँक आया था । उसने अपनी नोटबुक में से कागज़ फाडा । पानी न मिलने की शिकायत उस पर लिखी । सधे हुए क़दमों से वह शिकायत-पेटिका की ओर बढा ।
'ऊ....ई ...!' दर्द से चिल्लाते हुए युवक ने अपना हाथ शिकायत-पेटिका के जबड़ों में से वापिस खींच लिया । शिकायत वाला कागज़ नीचे गिर गया । पीली-पीली बर्रों का झुंड पेटिका में से निकल कर मँडराने लगा ।
'शीतल जल' वाली खिड़की के आगे से भीड़ छँटने लगी थी । नकली शीतल पेय बेचने वाले स्टाल पर भीड़ बढने लगी थी ।