चाहता है वंश-वृद्धि, कोई सुख-समृद्धि, चाँदी-सोना करे कोई धारण जहान में .
नीचे अपमान दुख सहता है इनसान, ऊँचे पद घेर खड़े चारण जहान में .
करे इंतज़ाम सारे, मन को आराम नहीं, सुख बने दुखों का भी कारण जहान में .
चाहो जो निवारण, तरीका असाधारण है रामजी के नाम का उच्चारण जहान में !
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बुधवार, 24 मार्च 2010
रविवार, 24 जनवरी 2010
आज नव गौरव के वैभव का उत्सव है
प्रतिदिन गिन-गिन देश की विदेश की जो
सूचनाओं-ख़बरों की रहता है टोह में
अपनों से दूर धन के नशे में चूर रहे
पड़े नहीं कभी निज देश के भी मोह में .
बार-बार पढ़े अख़बार न प्रभाव पड़े,
अंतर न लगे तुझे 'वाह' और 'ओह' में--
खोह से निकल, तू 'दधीचि' चल शामिल हो
आज ध्वजारोहण के ख़ास समारोह में !
जनवरी मास में है खास बात, सुनिए जी,
यूँ ही नहीं छाया आसपास ये उल्लास है .
देखा था ये सपना कि राज हो तो अपना ही,
आज का विशेष अपना ही इतिहास है .
त्याज्य वैमनस्य, गणराज्य अविभाज्य रहे,
दासता उदास, दीनता को बनवास है
विग्रह का पाठ नहीं, देखिये 'दधीचि' जी की
व्याकरण में तो बस संधि है, समास है !
आज नव गौरव के वैभव का उत्सव है,
कामना यही है, दूर दुख, द्वेष, खेद हो.
मानव-मानव में विच्छेद नहीं, एक साथ
बाइबल, कुरआन, गुरु ग्रन्थ, वेद हो .
रीति, धर्म, वेश-भूषा, भाषा हों अनेक यहाँ,
रंग हों अलग, फिर भी नहीं विभेद हो--
हवा अनुकूल, दिशा ठीक, देखना 'दधीचि'
देश की नौका के तले में न कोई छेद हो !
सूचनाओं-ख़बरों की रहता है टोह में
अपनों से दूर धन के नशे में चूर रहे
पड़े नहीं कभी निज देश के भी मोह में .
बार-बार पढ़े अख़बार न प्रभाव पड़े,
अंतर न लगे तुझे 'वाह' और 'ओह' में--
खोह से निकल, तू 'दधीचि' चल शामिल हो
आज ध्वजारोहण के ख़ास समारोह में !
जनवरी मास में है खास बात, सुनिए जी,
यूँ ही नहीं छाया आसपास ये उल्लास है .
देखा था ये सपना कि राज हो तो अपना ही,
आज का विशेष अपना ही इतिहास है .
त्याज्य वैमनस्य, गणराज्य अविभाज्य रहे,
दासता उदास, दीनता को बनवास है
विग्रह का पाठ नहीं, देखिये 'दधीचि' जी की
व्याकरण में तो बस संधि है, समास है !
आज नव गौरव के वैभव का उत्सव है,
कामना यही है, दूर दुख, द्वेष, खेद हो.
मानव-मानव में विच्छेद नहीं, एक साथ
बाइबल, कुरआन, गुरु ग्रन्थ, वेद हो .
रीति, धर्म, वेश-भूषा, भाषा हों अनेक यहाँ,
रंग हों अलग, फिर भी नहीं विभेद हो--
हवा अनुकूल, दिशा ठीक, देखना 'दधीचि'
देश की नौका के तले में न कोई छेद हो !
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गणतंत्र-दिवस,
ध्वजारोहण
शनिवार, 9 जनवरी 2010
बादल से निकल के आई हुई एक बूँद
बादल से निकल के आयी हुई एक बूँद
हुई है सफल जल के ही कल-कल में .
बत्तियाँ अनेक, लड़ी एक है प्रकाशमान
एक ही विद्युत् का प्रवाह है सकल में .
सदियों पुराना हो अँधेरा घेरा डाले हुए
भाग जाता है दिये की रोशनी से पल में .
दिये से जलाएँ दिया, देखते ही देखते यूँ
रमे हों 'दधीचि' उत्सवों की हलचल में !
हुई है सफल जल के ही कल-कल में .
बत्तियाँ अनेक, लड़ी एक है प्रकाशमान
एक ही विद्युत् का प्रवाह है सकल में .
सदियों पुराना हो अँधेरा घेरा डाले हुए
भाग जाता है दिये की रोशनी से पल में .
दिये से जलाएँ दिया, देखते ही देखते यूँ
रमे हों 'दधीचि' उत्सवों की हलचल में !
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