कोई नियम नहीं टूटा
नहीं विच्छिन्न हुआ कोई वैधानिक प्रावधान
एक मनभावन मुस्कान तो थी
छतनार दरख्तों के होठों पर
लेकिन बारिश से वह नम हो चुकी थी
कुछ फीकी और कुछ कम हो चुकी थी .
फैलते उजास में आभास था
थमे होने का.
थोड़ी देर पहले ही
थम गयी थीं बूँदें
हवा की परतों में कैद .
हर कोई चुप था लेकिन मुस्तैद .
नामालूम रहीं सारी तैयारियाँ
कहीं कोई संकेत नहीं था
किसी उत्सव या सज्जा का .
ऐसे में उसने खिड़की से झाँका .
हुआ सब कुछ सहज ही
कोई नियम नहीं टूटा .
बस सुनहरी हुईं पेड़ों की फुनगियाँ
सरसराती हवा के साथ
धीमी गुनगुनाहट में
परिंदों की सुगबुगाहट में
किसी के लिए तो था ही उसका सन्देश
'उठ जाग, मुसाफिर, भोर भई ....'