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सोमवार, 7 जुलाई 2014

जैसे घिरते बादल ...

शीतलता की सिहरन ऐसे
भरता मुझमें रूप तुम्हारा

                   जैसे घिरते बादल नभ के छोर

सावन की रातों-सी काली
आँखों में दो-चार सितारे

                   मस्ती से भर जाते उनके कोर

सुनी कहीं से मोर की बोली
उठ कर तुमने खिड़की खोली
मिल कर गले पवन-पाहुन से
बरबस अपनी देह भिगो ली

                  झूम उठा फिर तन का हर इक पोर

लगा तभी संकोच पिघलने
सपने मन में लगे मचलने
बौछारों की सुखद छुअन से
बेबस किया हमें बादल ने

                 भूल गए सब, हो कर प्रेम-विभोर 

रविवार, 26 मई 2013

रसास्वादन

हम दोनों गंभीरता से बहस कर रहे थे. क्या ऐसा संभव है कि किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच कोई भी बात एक-दूसरे से छिपी हुई न हो? दो मित्रों के बीच, पति-पत्नी के बीच या क और ख के बीच. क्या कोई रिश्ता इतना गहरा और अटूट हो सकता है कि हर अनुभव आपस में बाँट लिया जाए? यानी जान-बूझ कर कोई बात छिपाई न जाए?

विकास का विचार था कि ऐसा संभव है. संभव ही नहीं, ऐसा होता है. मुझे इस विषय में संदेह था.
जब क और ख दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते, तो दोनों के बीच आपसी विश्वास का ऐसा सम्पूर्ण रिश्ता कैसे हो सकता है?
चलो, आपसी विश्वास का न सही, क की ओर से ख के प्रति या ख की ओर से क के प्रति किसी एक तरफ से तो ऐसा रिश्ता हो ही सकता है, विकास समझौते के मूड में बोला.

मैं शायद उस से सहमत हो जाता, लेकिन अजीब बात यह थी कि उदाहरण के तौर पर उसने जिस रिश्ते का ज़िक्र किया, वह था खुद उसकी ओर से मेरे प्रति कोई छिपाव या दुराव न रखने का रिश्ता. वह ज़ोर दे कर कह रहा था कि उसने जान-बूझ कर कोई भी बात मुझ से कभी नहीं छिपाई थी. हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. पिछले आठ बरसों से हम साथ-साथ रहे हैं. विकास के परिवार, उसके मित्रों, उसकी व्यक्तिगत बातों की मुझे अच्छी जानकारी है. उसके एकांतप्रिय स्वभाव के कारण यूँ भी परिचितों का दायरा सीमित ही है.

विकास सुन्दर, स्मार्ट और तंदुरुस्त युवक है. उसके व्यक्तित्व के बहुत से पक्षों से मेरा गहरा परिचय है. उसका शब्दों को ठहरा-ठहरा कर धीरे-धीरे वाक्य बना कर बोलने का अंदाज़ किसी हद तक बनावटी लगता है. बात करते हुए हाथों का ख़ास ढंग से ऊपर-नीचे होना नए परिचितों को अखरता भी है. मेरे बहुत निकट होने की बात कहने वाले इस व्यक्ति की बातचीत मुझे हमेशा से औपचारिक और सजग लगती रही है. किसी सुखद अनुभव या गहरी पीड़ा को जब वह रुक-रुक कर घिसे-पिटे औपचारिक शब्दों में प्रकट करता है, तो सुनने वाले को उनके बनावटी होने के एहसास से कोफ़्त होने लगती है. प्रायः सुनने वाला व्यक्ति इतना अनईज़ी महसूस करता है कि उसे बीच में रोक कर उसका वाक्य स्वयं पूरा कर देना चाहता है. मैं ऐसा करता भी हूँ.

इसके बावजूद हमारी दोस्ती इतने लंबे अरसे से अबाध चल रही है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि एक तो हमारे बीच टकराव वाली कोई स्थिति कभी आयी ही नहीं, दूसरे एक अन्तरंग साथी की ज़रूरत के कारण हम दोनों अपने नितांत व्यक्तिगत अनुभवों को आपस में बांटते रहे.

तो मैं बता रहा था कि कैसे उसका बात करने का अंदाज़ मुझे या उसके अन्य परिचितों को अखरता है. मुझे याद है, लगभग चार महीने पहले एक दिन जब हम पिक्चर देख कर हॉल से बाहर निकले, तो दोनों हाथ थोड़ा ऊपर उठा कर उसने कहा, पिक्चर का मज़ा आ गया, यार! हीरो का अभिनय देख कर लगता ही नहीं कि वह अभिनय कर रहा है. कितना स्वभाविक! और पिक्चर की स्टोरी भी खूब ज़ोरदार रही और निर्देशन तो.....

वह ये वाक्य इतना रुक-रुक कर और शब्दों को लंबा कर के इस तरह से बोल रहा था कि अपनी आदत के मुताबिक मैंने वाक्य पूरा करते हुए कहा, निर्देशन तो खैर लाजवाब था. वह थोड़ा झेंप कर मुस्कराया. फिर बोला, बस, तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी लगती है. तुम जान जाते हो कि मैं क्या कहने वाला हूँ. तुम मुझे समझते हो. तुम हमेशा....

मेरे मुँह की बात छीन लेते हो, यही न? मैंने हँस कर कहा. हॉल से निकल कर सड़क पर आये, तो विकास ने कहा, यार, भूख लग रही है ज़ोरों की. चलो, आज किसी होटल में चल कर खाना खाते हैं.

भूख मुझे भी लगी थी. खाना खाते वक़्त भी विकास पिक्चर के बारे में बात करता रहा. होटल से चले, तो वह खाने की तारीफ़ में वैसे ही वाक्य बोल रहा था. क्या ज़ायकेदार खाना बनाते हैं कमबख्त! आज तो आनंद आ गया. मन तृप्त हो गया पूरी तरह.

खाना खाने के बाद वह मुझे अपने कमरे तक ले गया. ज़िद करने लगा कि मैं थोड़ी देर बैठूँ. बातें शुरू हुईं, तो नमिता की चर्चा चल पड़ी. नमिता निश्चित रूप से विकास की ओर आकर्षित थी. बल्कि, उससे प्रेम भी करती थी. वह एम्.फिल. की छात्रा थी. यूनिवर्सिटी में ही उन दोनों का परिचय हुआ था. उसके प्रेम-पत्र मुझे शुरू से ही विकास पढ़वाता रहा था. मेरे मना करने के बावजूद. इससे उसको ज़रूर संतोष मिलता था. उसके अहं की तुष्टि होती थी.

मुझे इस बात पर कोई हैरानी नहीं थी कि नमिता विकास को खूब चाहने लगी थी. उसके बारे में बहुत भावुक हो गयी थी. आखिर विकास गठीले बदन का आकर्षक युवक था. दोनों की जान-पहचान दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में बदल गयी, तो यह बिलकुल स्वाभाविक था. मेरे मन में कहीं यह ख़याल भी था कि इस रिश्ते से विकास का व्यक्तित्व कुछ निखरेगा और वह ज़्यादा गंभीर, संतुलित और समझदार हो जाएगा.

नमिता के पत्र आम प्रेम-पत्रों जैसे ही थे. प्रेम की अकुलाहट, प्रतीक्षा, पीड़ा, स्वप्नों, कल्पनाओं और शेरो-शायरी की तमाम बातें. बहरहाल, मैं रुचि ले कर उन्हें पढ़ता था और विकास के कहने पर उनका विश्लेषण और उनके आधार पर नमिता के स्वभाव आदि का थोड़ा-बहुत मूल्यांकन कर देता था.

पिक्चर वाली उस शाम के लगभग एक महीने बाद विकास जब मेरे कमरे पर आया, तो बड़ा खुश था. उत्साह उसके चेहरे से छलका पड़ रहा था. इस बीच हम हमेशा की तरह मिलते रहे थे. पर उस दिन वह बहुत प्रसन्न दिखाई दे  रहा था. कहने लगा, कल नमिता के साथ खूब बातें हुईं. मेरे कमरे पर ही. उसका डिज़र्टेशन लगभग पूरा हो गया है. बहुत प्यारी लड़की है. उसके परिवार के लोग तो पुराने विचारों के हैं, पर वह बड़ी साहसी और समझदार है.
वह तो ठीक है, लेकिन तुम कल की बात बता रहे थे, मैंने टोक कर कहा.
यूँ बात तो कुछ नहीं है. पर दोस्त, प्यार एक मधुर अनुभव है. पता नहीं, तुम्हें कभी हुआ या नहीं. उत्साह के कारण मैं रात भर सो नहीं सका.
आखिर कुछ बताओ भी. इन्सोम्निया तो एक बीमारी है, मैंने जान-बूझ कर उसे छेड़ा.
बस यार, पूछो मत. मज़ा आ गया कल. लाजवाब लड़की है नमिता. तीन-चार घंटे मेरे साथ रही. आनंद आ गया.
उसका चेहरा, उसकी भंगिमा, उसके शब्द, उसका अंदाज़ सब कुछ उस दिन जैसा ही था, जिस दिन हमने पिक्चर देख कर होटल में खाना खाया था.

इसके बाद वाले दो-तीन महीनों में न जाने क्यों, धीरे-धीरे विकास का दृष्टिकोण बदलने लगा. नमिता के पत्र उसके पास आते थे. पर वह छोटी-छोटी बातों को ले कर खीझ उठता था. उसकी भावुकता से चिढ़ने लगा था वह. छोटी-छोटी घटनाएं सुना कर वह मुझसे पूछता था, तुम्हीं बताओ, दोस्त, यह उसकी ज़्यादती नहीं है कि डॉ. मेहता के सामने वह मेरे साथ इस तरह बात करे?
या तुम फैसला करो. यह कहाँ की अक्लमंदी है कि तीन-तीन लड़कों के साथ कॉफी हाउस में बैठ कर घंटों गपशप करती रहे? चाहे वे इसके सहपाठी ही हों.
या फिर समय तय कर के मिलने न आना मुझे बिलकुल पसंद नहीं. ऐसी लापरवाह लड़की के साथ मैं सम्बन्ध नहीं रखना चाहता.

सच तो यह है कि इन सारी शिकायतों के बावजूद मैं नमिता को ज़्यादा दोषी नहीं मान  पा रहा था. इसलिए कभी-कभी नमिता की ओर से तर्क दे कर मैं उसे समझाने की कोशिश करता था.

पिछले इतवार को विकास मेरे पास आया और बोला, देखा, नरेश! मैं न कहता था कि यह लड़की ठीक नहीं है.
मैंने उसे उत्तेजित देख कर शांत होने को कहा, कौन लड़की? क्या हुआ? बैठ कर आराम से बताओ.
देखो, वह मेरे कमरे से चोरी कर के गयी है.
चोरी? मैं गंभीर हो गया, क्या-क्या चुराया उसने?
बाकी तो सारा कुछ चेक करने से पता चलेगा. अपने सारे प्रेम-पत्र तो उठा कर ले ही गयी है.

मुझे विकास की बातें बड़ी बेतुकी लगीं. नमिता एम्.फिल. कर के अपने शहर वापस चली गयी थी और जाने से पहले एहतियात के तौर पर अपने पत्र साथ ले गयी थी. पिछले दो-तीन महीनों में विकास के बदले हुए व्यवहार का यह स्वाभाविक परिणाम था.

कल रात मैंने विकास के कमरे पर ही खाना खाया. गो कि आज मैं उसके साथ अपने दोस्ती के रिश्ते की व्यर्थता समझ रहा हूँ, इस समझ को मैं लंबे अरसे से टालता आ रहा था. दरअसल, नमिता का एक पत्र आया था, जिसे पढवाने के लिए विशेष रूप से उसने मुझे कमरे पर बुलाया था. पत्र में इतने आत्मीय रिश्ते के टूटने का दर्द ज़ाहिर किया गया था. कुछ शेर थे जुदाई और ग़म के. मैं पत्र को पढ़ रहा था और विकास मेरे चेहरे को. पांच-छह पन्ने थे. आखरी पन्ना नीचे के कोने से थोड़ा-सा फटा हुआ था. इतना कि उस पर एक-दो वाक्य लिखे गये होंगे. मुझे आश्चर्य हुआ, संदेह भी. साफ़ पता लग रहा था कि विकास ने स्वयं यह हिस्सा फाड़ डाला था. पर वह तो मुझ से कुछ छिपाता नहीं था. आखिर उसने यह कोना क्यों फाड़ दिया?

खैर. पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया बताते हुए मैंने खाना शुरू किया. शुरू कर भी नहीं पाया था कि विकास बोल उठा, अरे, नींबू तो लाना भूल गया. तुम ठहरो. बस मैं दो मिनट में नींबू ले कर आता हूँ. उसके बिना आजकल खाने का मज़ा ही नहीं आता.
उसके कमरे के नज़दीक ही सड़क पर सब्ज़ी की दूकान थी. मैं रोकता, इस से पहले ही वह जा चुका था. मैं उठा. मेज़ पर रक्खे पत्र को उठा कर फिर से देखने लगा. उस फटे हुए कोने के बारे में मैं उत्सुक हो गया था. अचानक मेज़ के नीचे फर्श के कोने में पड़े मुड़े हुए कागज़ के पुर्जे पर मेरी नज़र पड़ी. लपक कर मैंने उसे उठाया. नमिता के खत का फटा हुआ हिस्सा था वह. लिखा था, मैं माँ बनने वाली हूँ और डॉक्टर ने अबोर्शन करने से इनकार कर दिया है. मैंने कागज़ को उसी तरह मोड़ कर वापस फेंक दिया.

विकास नींबू ले आया. हम दोनों खाना खाने लगे. दाल अच्छी बनी थी. खाते-खाते एकदम जैसे मुँह में कड़वाहट भर गयी. अपनी दाल में नींबू मैंने खुद निचोड़ा था. शायद एक-आध बीज दाल में आ गया था. विकास ने पूछा, क्या हुआ?
कुछ नहीं. नींबू का बीज था शायद, मैंने कहा.
विकास मुस्कराया, मैं जब भी नींबू निचोड़ता हूँ, तो बीज हमेशा निकाल देता हूँ. पूरी सावधानी से. नहीं तो दाल का सारा मज़ा ही खराब हो जाता है.


सोमवार, 11 जनवरी 2010

प्रेम न हाट बिकाय

" 'प्रेम' शब्द के इस्तेमाल पर तो अब कानूनी पाबंदी लग जानी चाहिए !" बहस के दौरान उत्तेजित हो कर महेंद्र ने अपना निर्णय सुनाया था .

लेकिन सर्वप्रीत इसे अंतिम फैसले के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा था . वह बहस जारी रखना चाहता था --" लेकिन 'प्रेम' शब्द के किस मायने में इस्तेमाल किये जाने पर पाबंदी लगाई जाये ? इसका अर्थ तो बड़ा व्यापक है ."

मैंने अपनी आदत के मुताबिक दोनों को संबोधित कर के कहा था--" देखो, डी एच लारेंस ने भी एक जगह ठीक यही पाबंदी लगा देने वाली बात कही है, हालाँकि खुद उसने इस शब्द का जम कर इस्तेमाल किया है ."

यह अतिरिक्त जानकारी थी, पर सर्वप्रीत का सवाल हमारे बीच अभी अनछुआ पड़ा था . जैसे टेबल पर उसके सामने रखा हुआ कॉफ़ी का कप .

कॉफ़ी-हाउस में कल रात यही रोचक बहस हुई थी . महेंद्र का मसीहाई अंदाज़, सर्वप्रीत की सवालों को उघाड़ कर साफ़-साफ़ शब्दों में सबके सामने रखने की आदत और मेरी विद्वत्ता-प्रदर्शन तथा सुलह-समझौता करवाने की प्रवृत्ति --- ये सब मिल कर बहस के लिए अच्छा वातावरण बना देते हैं . यूं बहस में मृत्युंजय, सत्यवीर, अनुपम और सुरेश भी खूब हिस्सा लेते हैं .

मेरे सामने मेज़ पर दो ख़त पड़े हैं. ये दोनों अरविन्द के ख़त हैं. अरविन्द भी हमारी मित्र-मंडली का सदस्य था. डेढ़ बरस पहले उसके पिताजी का तबादला हो गया था . एक ख़त पर तकरीबन आठ महीने पहले की तारीख है. उन दिनों अरविन्द डाक-तार विभाग में क्लर्क था. ऐसे प्रतिभाशाली लड़के को क्लर्की करनी पड़ रही थी, यह बात हम सबको बड़ी खेदजनक लगती थी. पर वह लगातार प्रतियोगिता-परीक्षाओं में बैठ रहा था और इंटरव्यू दे रहा था. उसके भविष्य के प्रति हम लोग ज्यादा चिंतित नहीं थे.

बहरहाल, यह पहला ख़त यूं है---

रवीन्द्र भाई,
आज तुम्हारी यह शिकायत दूर कर ही दूं कि मैं तुम्हें पत्र नहीं लिखता हूँ. पर सिर्फ शिकायत दूर करने के लिए पत्र नहीं लिख रहा हूँ. तुम सोचोगे ज़रूर कोई खास बात है, जो अरविन्द पत्र लिखने बैठा है . ठीक सोचा तुमने !

बात तो खास ही है. समझ में नहीं आता--किस सिरे से शुरू करूँ ? तुम्हें रेखा के विषय में शुष्क तथ्यों पर आधारित जानकारी दे कर बात ख़त्म कर दूं, तो चिट्ठी लिखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा. इतना तो बता ही दूं कि रेखा के साथ मेरी सगाई हो गयी है और मैं बहुत-बहुत खुश हूँ. मैं उस से प्रेम करने लगा हूँ. तुम भी उस से मिलोगे, तो मान जाओगे कि मैं सचमुच बहुत भाग्यशाली हूँ.

इतना मौलिक चिंतन करने वाला आदमी कैसे घिसे-पिटे फ़िल्मी संवाद पत्र में लिख रहा है -- यही सोच रहे हो न तुम ? मेरे भाई, यह प्यार बड़े-बड़े लोगों को ख़ुशी से पागल कर देता है. रेखा बड़ी सादगी-पसंद लड़की है और उसके इस सादगीभरे नारीत्व ने मुझे बहुत प्रभावित किया है. मेरे पिताजी को तो तुम जानते ही हो. कितनी पैनी नज़र है उनकी और कैसा अप्रभावित रहने का स्वभाव. उन्होंने भी कई बार रेखा की खुल कर प्रशंसा की है .

रेखा यह ज़रूर चाहती है कि मैं किसी अच्छे पद पर कार्य करूँ, लेकिन मेरे क्लर्क होने के कारण कोई हीन-भावना उसके मन में नहीं है . तुम तो जानते हो, मैं खुद कितना प्रयास कर रहा हूँ किसी अच्छे पद पर पहुँचने के लिए.

तुम इस तरफ कब आ रहे हो ? तुम्हें रेखा से मिलवाऊँगा . पत्र का उत्तर तो एकदम दोगे ही. माफ़ करना, यार, जल्दी में सगाई हुई; तुम्हें निमंत्रण भी नहीं भेज सका. अब शादी पर तुम्हें ज़रूर पहुंचना है. जल्दी ही तुम्हें निमंत्रण मिलेगा.

अच्छा. महेंद्र, सर्वप्रीत, सुरेश, मृत्युंजय, सत्यवीर, और अनुपम को भी यह खबर सुना देना. कहना-- अरविन्द तुम सब को बहुत याद करता है.

तुम्हारा अपना,
अरविन्द

दूसरा पत्र आज सुबह ही आया है. लेकिन वह पत्र आपको दिखाने से पहले मैं यह बता दूँ कि इन आठ महीनों में क्या हुआ है. हमारी बैठकें कॉफ़ी-हाउस में पहले की तरह जमती रही हैं. इस बीच महेंद्र का पी-एच डी के लिए रजिस्ट्रेशन हो गया है. मृत्युंजय मुंबई में एक सेमिनार में भाग लेने गया था. अनुपमकी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है. और अरविन्द भी दो-एक बार यहाँ आया

पहली बार जब आया, तो उसने बड़ा बोर किया. उसका 'रेखा-पुराण' द्रौपदी के चीर की तरह समाप्त ही नहीं हो रहा था. इतना तो कभी सुरेश की अति बौद्धिक कविताओं ने भी हमें बोर नहीं किया था. मैं मानता हूँ, मुझे अपने मित्र की ख़ुशी में शामिल होना चाहिए. मैं यह भी नहीं कहता कि रेखा के प्रति उसका प्रेम महज़ किशोरावस्था का पागलपन है या किसी अपरिपक्व मस्तिष्क की वायवीय कल्पना-मात्र है. उसका प्रेम गंभीर और सच्चा होगा. इस विषय में मैं अपनी किसी भी तरह की राय को असंगत ही समझता हूँ.

खैर, दूसरी बार वह एक शुभ सूचना लेकर आया. सिविल सर्विसेज़ की प्रतियोगी परीक्षा में वह सफल हो गया था और उसका इंटरव्यू भी अच्छा रहा था. शीघ्र ही वह ऊँचे दर्जे का सरकारी अफसर बनने वाला था. उसने काफी-हाउस में ही अच्छी-खासी पार्टी हम दोस्तों को दी. इस बार उसने रेखा के साथ अपने सुखद भविष्य की योजनाएँ भी बनाईं. वे योजनाएँ यथार्थ से कटी हुई या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं थीं.

इसके बाद मृत्युंजय सेमिनार से लौटते हुए रास्ते में एक दिन अरविन्द के यहाँ ठहरा. उसने आ कर सूचना दी कि इंटरव्यू में भी अरविन्द सफल रहा था. मुझे, दर असल, उसके विवाह के निमंत्रण-पत्र की प्रतीक्षा थी. मुझे आशा थी कि प्रोबेशन पर जाने से पहले वह विवाह कर लेगा.

और आज सुबह यह दूसरा पत्र आया है ---

रवीन्द्र भाई,

तुम सोचते होगे -- कम्बख्त अच्छी-खासी नौकरी पर लगा है; शादी न जाने कब करेगा ? ठीक है . इसी महीने शादी कर रहा हूँ. औपचारिक निमंत्रण-पत्र अलग से भेजूंगा.

तुम्हें कल्पना के बारे में तो नहीं बताया न ? बताता भी कैसे ? अभी एक सप्ताह पहले तो उस से परिचय हुआ है. उसके पापा पिताजी के एक मित्र के मित्र हैं. बस, पिताजी से उन्हों ने मेरे बारे में बात की. पिताजी को कल्पना पसंद है. उसके साथ विवाह से दो दिन पहले सगाई की रस्म भी हो जायेगी. मुझे भी कल्पना बड़ी समझदार और सुलझी हुई लड़की लगी. दिल्ली के एक कॉलेज में समाज-शास्त्र की प्राध्यापिका है. उसके पापा यहाँ के प्रतिष्ठित वकीलों में से हैं.

रेखा के बारे में जानना चाहते हो तुम ? बस, मामला कुछ जमा नहीं. पिताजी उसके पापा के साथ कुछ ज़रूरी बातें करने गए थे. यही विवाह के सिलसिले में. उन्होंने लौट कर बताया कि ज्यादा उत्साहवर्धक 'रिस्पौंस' नहीं मिला. इसके बाद आगे बढने का तो सवाल ही नहीं था.

कल्पना मुझे खूब पसंद है. बल्कि, मैं उस से प्यार करने लगा हूँ. मुझे ऐसी ही जीवन-संगिनी की तलाश थी. अच्छा, मुझे अभी सूट की सिलाई के लिए टेलर के पास जाना है. घर पर सबको यथोचित अभिवादन. मित्र-मण्डली को तो मैं प्रायः याद करता रहता हूँ.

तुम्हारा अपना,
अरविन्द

शाम हो रही है. मैं यह दूसरा पत्र चुपचाप जेब में डाल कर कॉफ़ी-हाउस की तरफ चल पड़ता हूँ. आज पहली बार मैं एक मित्र के व्यक्तिगत पत्र को टेबल पर अन्य मित्रों के सामने रखूँगा और चाहूँगा कि इस पर चर्चा हो.

कॉफ़ी-हाउस में सब पहुँच चुके हैं. मैं जेब से पत्र निकाल कर टेबल पर रखता हूँ. पत्र का पोस्ट-मार्टम होता है. सुरेश कहता है -- " इतना स्पष्ट है कि अरविन्द अगर सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा में अच्छे अंक ले कर सरकारी अफसर न लगा होता, तो कल्पना के पापा की ओर से रिश्ता कभी नहीं आता और रेखा के साथ उसकी मँगनी बिलकुल नहीं टूटती."

सत्यवीर को भी रेखा के साथ सहानुभूति है. वह बताना चाहता है कि ऐसी घटनाएँ प्रायः होती हैं, लेकिन हमारा एक मित्र पैसे के लालच में ऐसे सम्बन्ध को तोड़ दे --- यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. वह इसे साफ़-साफ़ दहेज के लालच का मामला मानता है.

अनुपम का कहना है -- " यह सरासर अन्याय है. जब प्यार करने के बाद अरविन्द ने शादी करना ज़रूरी नहीं समझा, तो शादी करते समय कल्पना से प्यार करना ज़रूरी क्यों समझता है वह ?"

मुझे सर्वप्रीत का वह सवाल अचानक याद आ गया है --" 'प्रेम' शब्द के किस मायने में इस्तेमाल किये जाने पर पाबंदी लगे जाये ?" मैं सबको वह बात याद दिलाता हूँ और महेंद्र अपने उसी निर्णयात्मक लहजे में बोल उठता है -- " ठीक है. यह सर्वप्रीत के सवाल का आंशिक जवाब है. कम-से-कम इस मायने में 'प्रेम' शब्द के इस्तेमाल पर पाबंदी लग ही जानी चाहिए, जिस मायने में अरविन्द ने इसे इस पत्र में इस्तेमाल किया है. यह बिलकुल झूठ है. वह प्यार नहीं करता है. वह प्यार करने के लिए खुद को तैयार कर रहा है, मना रहा है."

यही आत्म-प्रवंचना, मेरी नज़र में, असली त्रासदी है. रेखा की सगाई टूट जाना दुःख की बात है. अरविन्द जैसे क्रान्तिधर्मा नवयुवक का समय आने पर पिताजी के दड़बे में दुबक जाना और इस तरह रेखा को धोखा देना उससे भी ज्यादा दुःख की बात है. पर यह अपने आप को धोखे में डालने की कोशिश बड़ी पीड़ादायक स्थिति है. और इस से बुरी सिर्फ एक बात हो सकती है.
वह यह कि कल महेंद्र, सर्वप्रीत, मृत्युंजय, सत्यवीर, अनुपम, सुरेश और खुद रवीन्द्र में से कोई अरविन्द के इस दुसरे पत्र जैसा पत्र किसी को लिखे !