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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गाँव की याद

व्यस्त रहे कामों में, फिर भी नहीं आज तक भूले,
आम तोड़ कर तुम मुझसे कहती थीं, 'पहले तू ले!'
क्या अब भी हैं खेल वही, 'छू सकती है, तो छू ले!'
लिखना, अब के बरस, सखी, क्या फिर पलाश हैं फूले?
क्या सावन में अब भी वैसे ही सजते हैं झूले?

सोमवार, 7 जुलाई 2014

जैसे घिरते बादल ...

शीतलता की सिहरन ऐसे
भरता मुझमें रूप तुम्हारा

                   जैसे घिरते बादल नभ के छोर

सावन की रातों-सी काली
आँखों में दो-चार सितारे

                   मस्ती से भर जाते उनके कोर

सुनी कहीं से मोर की बोली
उठ कर तुमने खिड़की खोली
मिल कर गले पवन-पाहुन से
बरबस अपनी देह भिगो ली

                  झूम उठा फिर तन का हर इक पोर

लगा तभी संकोच पिघलने
सपने मन में लगे मचलने
बौछारों की सुखद छुअन से
बेबस किया हमें बादल ने

                 भूल गए सब, हो कर प्रेम-विभोर 

शनिवार, 27 जुलाई 2013

सावन का इतना ही ....

सावन का इतना ही किस्सा है बस
थोड़ी-सी बारिश है, ज़्यादा उमस.

धरती की आस-प्यास देख ज़रा देख
जम के बरसियो तू अब के बरस.

हम हैं फरियादी और वो संगदिल
दोनों ही होंगे नहीं टस से मस.

अब के सावन-भादों यूँ गुज़रे ज्यूँ
रस बिन बरस में महीने हों दस.