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शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

ग़ज़ल

तब्सरा ये क़त्ल पर उनका हुआ--
"ठीक है, ऐसा हुआ, तो क्या हुआ?"

अपना मुस्तकबिल लगा था दाँव पर,
कितनी आसानी से ये सौदा हुआ !

ज़िक्र तक उस बात का आया नहीं,
आपका चेहरा है क्यूँ उतरा हुआ?

बात कल ऐसी कही मैंने कि वो
आज भी है सोच में डूबा हुआ ।

लब हिले उसके तो मैं समझा नहीं
वो उठा था 'अलविदा' कहता हुआ ।

आ रहा है आप की जानिब, जनाब!
बेअदब सैलाब ये बढ़ता हुआ ।

था तकाज़ा फ़र्ज़ का, बस इसलिए?
आप ही कहिये, ये क्या मिलना हुआ?