लघु कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लघु कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गाँव की याद

व्यस्त रहे कामों में, फिर भी नहीं आज तक भूले,
आम तोड़ कर तुम मुझसे कहती थीं, 'पहले तू ले!'
क्या अब भी हैं खेल वही, 'छू सकती है, तो छू ले!'
लिखना, अब के बरस, सखी, क्या फिर पलाश हैं फूले?
क्या सावन में अब भी वैसे ही सजते हैं झूले?

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

अख़बार में चेहरा

आज अख़बार में वो चेहरा आइना-सा लगा,
जिस पे लिक्खा था महज़ इतना - 'गुमशुदा की तलाश'!

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

लोगों का हित नहीं किसी को याद रहा है....

लोगों का हित नहीं किसी को याद रहा है
बेमतलब बातों पर खूब विवाद रहा है.

पैर तले कुचला यह अपनेपन का जज़्बा
यही हमारे चिंतन की बुनियाद रहा है.

जिनके बीज यहाँ पर दुश्मन ने बोये थे,
मनमुटाव उन विष-बेलों की खाद रहा है.

चुपके-चुपके तेरी सुख की नींद चुरा कर

कोई अपने सपने तुझ पर लाद रहा है.  

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

एक दृश्य एक एहसास: तादात्म्य



साँस लेता हुआ-सा वातावरण
अनजाने, अनदेखे, निःस्वर
मेरी साँसों में घुल-मिल कर
होता एकाकार ?
अथवा
मैं ही धीरे-धीरे
मिट-मिट कर
इस दृश्य-फलक पर

बनता जाता हूँ संसार ?  

बुधवार, 17 जुलाई 2013

मन की बात

मन की बात छिपाने को तू चाहे जो कह जा
नदी बना कर शब्दों की तू खुद उसमें बह जा
अर्थ समझने वाले केवल शब्द नहीं सुनते हैं
देख लिया करते हैं चेहरा, हाव-भाव, लहजा !

शनिवार, 8 जून 2013

काम

आदमी बीमार होता है। 
काम कर नहीं सकता।

आराम करता है।

औरत बीमार होती है. 
काम कर नहीं सकती .

काम करती है! 

शुक्रवार, 10 मई 2013

वोटर-वार्ता

राजनीति का मंजा खिलाड़ी हाथ जोड़ता आया.
एक नए वोटर से उसका परिचय जब करवाया,
वोटर बोला, 'अक्सर आपके बारे में सुनते हैं,'
उत्तर मिला, 'मगर साबित तो कुछ भी नहीं हो पाया!'

रविवार, 29 अगस्त 2010

एक दृश्य एक एहसास: तादात्म्य

साँस लेता हुआ-सा वातावरण
अनजाने, अनदेखे, निःस्वर
मेरी साँसों में घुल-मिल कर
होता एकाकार ?
अथवा
मैं ही धीरे-धीरे
मिट-मिट कर
इस दृश्य-फलक पर
बनता जाता हूँ संसार ?

बुधवार, 24 मार्च 2010

रामनवमी के अवसर पर

चाहता है वंश-वृद्धि, कोई सुख-समृद्धि, चाँदी-सोना करे कोई धारण जहान में .
नीचे अपमान दुख सहता है इनसान, ऊँचे पद घेर खड़े चारण जहान में .
करे इंतज़ाम सारे, मन को आराम नहीं, सुख बने दुखों का भी कारण जहान में .
चाहो जो निवारण, तरीका असाधारण है रामजी के नाम का उच्चारण जहान में !

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

गृहिणी

आज वैलेंटाइन डे है, सो यह प्रेम कविता गृहिणी के लिए, जिस के बारे में कवि अक्सर कुछ नहीं कहते. वह केवल हास्य-कविताओं में स्थान पाती है .

जादू की तरह मौजूद रहती है वह घर में
जादू से कम नहीं होते उसके कारनामे.
चीज़ों को जिद रहती है
टूटने की, फटने की,
बिखरने और गुम होने की.
और वह ऐसा होने नहीं देती.
चीज़ों की बेतुकी ज़िद के ख़िलाफ़
जम कर टक्कर लेती है .
जादू से कम नहीं उसका इस घर में होना
उसके होने के सबूत बार-बार देता है
इस छोटे-से घर का कोना-कोना !

शनिवार, 9 जनवरी 2010

बादल से निकल के आई हुई एक बूँद

बादल से निकल के आयी हुई एक बूँद
हुई है सफल जल के ही कल-कल में .
बत्तियाँ अनेक, लड़ी एक है प्रकाशमान
एक ही विद्युत् का प्रवाह है सकल में .
सदियों पुराना हो अँधेरा घेरा डाले हुए
भाग जाता है दिये की रोशनी से पल में .
दिये से जलाएँ दिया, देखते ही देखते यूँ
रमे हों 'दधीचि' उत्सवों की हलचल में !

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

अंतराल

मेरे पुरखे कितने विवश और असहाय
रहे होंगे
उन्हें इस प्यारी धरती को
मेरे हवाले कर के आखिर जाना पड़ा .
मेरे बच्चों के बच्चे
कितने विवश और असहाय होंगे
कैसी धरती होगी
जिसे मैं उनके हवाले कर के जाऊँगा !
इस अंतराल में कोई विवश और असहाय नहीं है
तो वह मैं हूँ !

सोमवार, 30 नवंबर 2009

वे खुश हुए

बाड़ बन कर रौंद डाला खेत, तब वे खुश हुए ।
खा गयी हरियालियाँ सब रेत, तब वे खुश हुए ।
मार कर कुल्हाड़ियाँ स्वयमेव अपने पाँव पर
बन गया इन्सान जिंदा प्रेत, तब वे खुश हुए ।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

कवच नहीं बन सके...

कवच नहीं बन सके डिठौने बच्चों के ।
काँटों से भर गए बिछौने बच्चों के ।

दुगनी लगन काम की, तिगुना लाभ मिले,
दाम मजूरी के हैं पौने बच्चों के ।

दुनियादारी की इन ऊँची बातों से
सपने हो जायेंगे बौने बच्चों के ।

बन कर कल असलियत सामने आएँगी,
बंदूकें हैं आज खिलौने बच्चों के !

बुधवार, 11 नवंबर 2009

जनादेश

फिर बुलाया कुर्सियों ने बैठने को
फिर सभी को बैठने की हड़बडी है ।
ज़रा रुक कर वोट का संदेश समझें
अब ज़रूरत भी भला किसको पड़ी है ?
ये निबट लें तो शुरू हो काम कोई
सोच में डूबी हुई जनता खड़ी है !

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

सत्रह हज़ार बधाइयाँ

खेल हो कठिन जिस दिन पिच साथ न दे
'लूज़' को बदल देता 'विन' में, कमाल है ।
गिन-गिन रन लेते रहने के बावजूद
हारने लगे जो टीम, लेता वो सँभाल है ।
गेंद चाहे तेज़ चाहे 'स्पिन' हो, लेकिन उसे
नहले पे दहला लगाना तत्काल है ।
बात तो ज़रूर कोई उसकी क्रिकेट में है
तभी तो सचिन बिन गलती न दाल है ।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

आपस का हो प्रेम...

आपस का हो प्रेम जहाँ पर

मिलता है उल्लास वहीं ।

दीप जहाँ भी रख दोगे तुम

होगा स्वयं उजास वहीं ।

पूजन से प्रसन्न हो कर

आएँगी लक्ष्मी, मगर सुनो--

नारायण का वास जहाँ है

लक्ष्मी करती वास वहीं ।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

जय जवान जय किसान ...?

जान लेना देश के हर शत्रु की, फिर जान देना

है जवानी का यही अंदाज़ अपने देश में ।

कृषक अपनी जान लेने को विवश हैं, बोलिए---

किसे अपने देश पर है नाज़ अपने देश में ?

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

घर-बाज़ार

घर में देर-सबेर भी जब पहुँचेंगे आप

हर चेहरे पर पाएँगे अपनेपन की छाप ।

अपनेपन की छाप मगर बाज़ार अलग है ।

मोल-भाव या हानि-लाभ व्यापार अलग है ।

कहँ दधीचि क्या यह सुधार है जीवन-स्तर में ?

संभलो, अब बाज़ार घुसा आता है घर में !

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

सोचो

सोचो, सही-ग़लत को ले कर

नोक कलम की पैनी क्यों है ?

बाज़ अगर है बेकुसूर, तो

चिड़ियों में बेचैनी क्यों है ?