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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

मर्मस्थल पर वार हो रहे .....

मर्मस्थल पर वार हो रहे, बचने का भी ठौर नहीं
जड़ें कटीं तो ज़ाहिर है, आमों पर होगा बौर नहीं.

आज हमारी ख़ामोशी जो कवच सरीखी लगती है
कल इसके शिकार भी यारो, हमीं बनेंगे, और नहीं.

हिलने लगते राजसिंहासन धरती करवट लेती है
महलों में जब दावत हो, भूखी जनता को कौर नहीं.

कृपया मुझको महज़ वोट से कुछ ऊँचा दर्जा दीजे
क्षमा करें, क्या मेरी ये दरख्वास्त काबिले-गौर नहीं?

इस युग में भी सीधी-सच्ची बातें करते फिरते हो
चलन यहाँ का समझ न पाए, सीखे जग के तौर नहीं.

ठीक नहीं यूँ छोड़ बैठना परिवर्तन की उम्मीदें

खुद को अगर बदल लें हम, तो क्या बदलेगा दौर नहीं?