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रविवार, 26 मई 2013

रसास्वादन

हम दोनों गंभीरता से बहस कर रहे थे. क्या ऐसा संभव है कि किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच कोई भी बात एक-दूसरे से छिपी हुई न हो? दो मित्रों के बीच, पति-पत्नी के बीच या क और ख के बीच. क्या कोई रिश्ता इतना गहरा और अटूट हो सकता है कि हर अनुभव आपस में बाँट लिया जाए? यानी जान-बूझ कर कोई बात छिपाई न जाए?

विकास का विचार था कि ऐसा संभव है. संभव ही नहीं, ऐसा होता है. मुझे इस विषय में संदेह था.
जब क और ख दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते, तो दोनों के बीच आपसी विश्वास का ऐसा सम्पूर्ण रिश्ता कैसे हो सकता है?
चलो, आपसी विश्वास का न सही, क की ओर से ख के प्रति या ख की ओर से क के प्रति किसी एक तरफ से तो ऐसा रिश्ता हो ही सकता है, विकास समझौते के मूड में बोला.

मैं शायद उस से सहमत हो जाता, लेकिन अजीब बात यह थी कि उदाहरण के तौर पर उसने जिस रिश्ते का ज़िक्र किया, वह था खुद उसकी ओर से मेरे प्रति कोई छिपाव या दुराव न रखने का रिश्ता. वह ज़ोर दे कर कह रहा था कि उसने जान-बूझ कर कोई भी बात मुझ से कभी नहीं छिपाई थी. हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. पिछले आठ बरसों से हम साथ-साथ रहे हैं. विकास के परिवार, उसके मित्रों, उसकी व्यक्तिगत बातों की मुझे अच्छी जानकारी है. उसके एकांतप्रिय स्वभाव के कारण यूँ भी परिचितों का दायरा सीमित ही है.

विकास सुन्दर, स्मार्ट और तंदुरुस्त युवक है. उसके व्यक्तित्व के बहुत से पक्षों से मेरा गहरा परिचय है. उसका शब्दों को ठहरा-ठहरा कर धीरे-धीरे वाक्य बना कर बोलने का अंदाज़ किसी हद तक बनावटी लगता है. बात करते हुए हाथों का ख़ास ढंग से ऊपर-नीचे होना नए परिचितों को अखरता भी है. मेरे बहुत निकट होने की बात कहने वाले इस व्यक्ति की बातचीत मुझे हमेशा से औपचारिक और सजग लगती रही है. किसी सुखद अनुभव या गहरी पीड़ा को जब वह रुक-रुक कर घिसे-पिटे औपचारिक शब्दों में प्रकट करता है, तो सुनने वाले को उनके बनावटी होने के एहसास से कोफ़्त होने लगती है. प्रायः सुनने वाला व्यक्ति इतना अनईज़ी महसूस करता है कि उसे बीच में रोक कर उसका वाक्य स्वयं पूरा कर देना चाहता है. मैं ऐसा करता भी हूँ.

इसके बावजूद हमारी दोस्ती इतने लंबे अरसे से अबाध चल रही है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि एक तो हमारे बीच टकराव वाली कोई स्थिति कभी आयी ही नहीं, दूसरे एक अन्तरंग साथी की ज़रूरत के कारण हम दोनों अपने नितांत व्यक्तिगत अनुभवों को आपस में बांटते रहे.

तो मैं बता रहा था कि कैसे उसका बात करने का अंदाज़ मुझे या उसके अन्य परिचितों को अखरता है. मुझे याद है, लगभग चार महीने पहले एक दिन जब हम पिक्चर देख कर हॉल से बाहर निकले, तो दोनों हाथ थोड़ा ऊपर उठा कर उसने कहा, पिक्चर का मज़ा आ गया, यार! हीरो का अभिनय देख कर लगता ही नहीं कि वह अभिनय कर रहा है. कितना स्वभाविक! और पिक्चर की स्टोरी भी खूब ज़ोरदार रही और निर्देशन तो.....

वह ये वाक्य इतना रुक-रुक कर और शब्दों को लंबा कर के इस तरह से बोल रहा था कि अपनी आदत के मुताबिक मैंने वाक्य पूरा करते हुए कहा, निर्देशन तो खैर लाजवाब था. वह थोड़ा झेंप कर मुस्कराया. फिर बोला, बस, तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी लगती है. तुम जान जाते हो कि मैं क्या कहने वाला हूँ. तुम मुझे समझते हो. तुम हमेशा....

मेरे मुँह की बात छीन लेते हो, यही न? मैंने हँस कर कहा. हॉल से निकल कर सड़क पर आये, तो विकास ने कहा, यार, भूख लग रही है ज़ोरों की. चलो, आज किसी होटल में चल कर खाना खाते हैं.

भूख मुझे भी लगी थी. खाना खाते वक़्त भी विकास पिक्चर के बारे में बात करता रहा. होटल से चले, तो वह खाने की तारीफ़ में वैसे ही वाक्य बोल रहा था. क्या ज़ायकेदार खाना बनाते हैं कमबख्त! आज तो आनंद आ गया. मन तृप्त हो गया पूरी तरह.

खाना खाने के बाद वह मुझे अपने कमरे तक ले गया. ज़िद करने लगा कि मैं थोड़ी देर बैठूँ. बातें शुरू हुईं, तो नमिता की चर्चा चल पड़ी. नमिता निश्चित रूप से विकास की ओर आकर्षित थी. बल्कि, उससे प्रेम भी करती थी. वह एम्.फिल. की छात्रा थी. यूनिवर्सिटी में ही उन दोनों का परिचय हुआ था. उसके प्रेम-पत्र मुझे शुरू से ही विकास पढ़वाता रहा था. मेरे मना करने के बावजूद. इससे उसको ज़रूर संतोष मिलता था. उसके अहं की तुष्टि होती थी.

मुझे इस बात पर कोई हैरानी नहीं थी कि नमिता विकास को खूब चाहने लगी थी. उसके बारे में बहुत भावुक हो गयी थी. आखिर विकास गठीले बदन का आकर्षक युवक था. दोनों की जान-पहचान दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में बदल गयी, तो यह बिलकुल स्वाभाविक था. मेरे मन में कहीं यह ख़याल भी था कि इस रिश्ते से विकास का व्यक्तित्व कुछ निखरेगा और वह ज़्यादा गंभीर, संतुलित और समझदार हो जाएगा.

नमिता के पत्र आम प्रेम-पत्रों जैसे ही थे. प्रेम की अकुलाहट, प्रतीक्षा, पीड़ा, स्वप्नों, कल्पनाओं और शेरो-शायरी की तमाम बातें. बहरहाल, मैं रुचि ले कर उन्हें पढ़ता था और विकास के कहने पर उनका विश्लेषण और उनके आधार पर नमिता के स्वभाव आदि का थोड़ा-बहुत मूल्यांकन कर देता था.

पिक्चर वाली उस शाम के लगभग एक महीने बाद विकास जब मेरे कमरे पर आया, तो बड़ा खुश था. उत्साह उसके चेहरे से छलका पड़ रहा था. इस बीच हम हमेशा की तरह मिलते रहे थे. पर उस दिन वह बहुत प्रसन्न दिखाई दे  रहा था. कहने लगा, कल नमिता के साथ खूब बातें हुईं. मेरे कमरे पर ही. उसका डिज़र्टेशन लगभग पूरा हो गया है. बहुत प्यारी लड़की है. उसके परिवार के लोग तो पुराने विचारों के हैं, पर वह बड़ी साहसी और समझदार है.
वह तो ठीक है, लेकिन तुम कल की बात बता रहे थे, मैंने टोक कर कहा.
यूँ बात तो कुछ नहीं है. पर दोस्त, प्यार एक मधुर अनुभव है. पता नहीं, तुम्हें कभी हुआ या नहीं. उत्साह के कारण मैं रात भर सो नहीं सका.
आखिर कुछ बताओ भी. इन्सोम्निया तो एक बीमारी है, मैंने जान-बूझ कर उसे छेड़ा.
बस यार, पूछो मत. मज़ा आ गया कल. लाजवाब लड़की है नमिता. तीन-चार घंटे मेरे साथ रही. आनंद आ गया.
उसका चेहरा, उसकी भंगिमा, उसके शब्द, उसका अंदाज़ सब कुछ उस दिन जैसा ही था, जिस दिन हमने पिक्चर देख कर होटल में खाना खाया था.

इसके बाद वाले दो-तीन महीनों में न जाने क्यों, धीरे-धीरे विकास का दृष्टिकोण बदलने लगा. नमिता के पत्र उसके पास आते थे. पर वह छोटी-छोटी बातों को ले कर खीझ उठता था. उसकी भावुकता से चिढ़ने लगा था वह. छोटी-छोटी घटनाएं सुना कर वह मुझसे पूछता था, तुम्हीं बताओ, दोस्त, यह उसकी ज़्यादती नहीं है कि डॉ. मेहता के सामने वह मेरे साथ इस तरह बात करे?
या तुम फैसला करो. यह कहाँ की अक्लमंदी है कि तीन-तीन लड़कों के साथ कॉफी हाउस में बैठ कर घंटों गपशप करती रहे? चाहे वे इसके सहपाठी ही हों.
या फिर समय तय कर के मिलने न आना मुझे बिलकुल पसंद नहीं. ऐसी लापरवाह लड़की के साथ मैं सम्बन्ध नहीं रखना चाहता.

सच तो यह है कि इन सारी शिकायतों के बावजूद मैं नमिता को ज़्यादा दोषी नहीं मान  पा रहा था. इसलिए कभी-कभी नमिता की ओर से तर्क दे कर मैं उसे समझाने की कोशिश करता था.

पिछले इतवार को विकास मेरे पास आया और बोला, देखा, नरेश! मैं न कहता था कि यह लड़की ठीक नहीं है.
मैंने उसे उत्तेजित देख कर शांत होने को कहा, कौन लड़की? क्या हुआ? बैठ कर आराम से बताओ.
देखो, वह मेरे कमरे से चोरी कर के गयी है.
चोरी? मैं गंभीर हो गया, क्या-क्या चुराया उसने?
बाकी तो सारा कुछ चेक करने से पता चलेगा. अपने सारे प्रेम-पत्र तो उठा कर ले ही गयी है.

मुझे विकास की बातें बड़ी बेतुकी लगीं. नमिता एम्.फिल. कर के अपने शहर वापस चली गयी थी और जाने से पहले एहतियात के तौर पर अपने पत्र साथ ले गयी थी. पिछले दो-तीन महीनों में विकास के बदले हुए व्यवहार का यह स्वाभाविक परिणाम था.

कल रात मैंने विकास के कमरे पर ही खाना खाया. गो कि आज मैं उसके साथ अपने दोस्ती के रिश्ते की व्यर्थता समझ रहा हूँ, इस समझ को मैं लंबे अरसे से टालता आ रहा था. दरअसल, नमिता का एक पत्र आया था, जिसे पढवाने के लिए विशेष रूप से उसने मुझे कमरे पर बुलाया था. पत्र में इतने आत्मीय रिश्ते के टूटने का दर्द ज़ाहिर किया गया था. कुछ शेर थे जुदाई और ग़म के. मैं पत्र को पढ़ रहा था और विकास मेरे चेहरे को. पांच-छह पन्ने थे. आखरी पन्ना नीचे के कोने से थोड़ा-सा फटा हुआ था. इतना कि उस पर एक-दो वाक्य लिखे गये होंगे. मुझे आश्चर्य हुआ, संदेह भी. साफ़ पता लग रहा था कि विकास ने स्वयं यह हिस्सा फाड़ डाला था. पर वह तो मुझ से कुछ छिपाता नहीं था. आखिर उसने यह कोना क्यों फाड़ दिया?

खैर. पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया बताते हुए मैंने खाना शुरू किया. शुरू कर भी नहीं पाया था कि विकास बोल उठा, अरे, नींबू तो लाना भूल गया. तुम ठहरो. बस मैं दो मिनट में नींबू ले कर आता हूँ. उसके बिना आजकल खाने का मज़ा ही नहीं आता.
उसके कमरे के नज़दीक ही सड़क पर सब्ज़ी की दूकान थी. मैं रोकता, इस से पहले ही वह जा चुका था. मैं उठा. मेज़ पर रक्खे पत्र को उठा कर फिर से देखने लगा. उस फटे हुए कोने के बारे में मैं उत्सुक हो गया था. अचानक मेज़ के नीचे फर्श के कोने में पड़े मुड़े हुए कागज़ के पुर्जे पर मेरी नज़र पड़ी. लपक कर मैंने उसे उठाया. नमिता के खत का फटा हुआ हिस्सा था वह. लिखा था, मैं माँ बनने वाली हूँ और डॉक्टर ने अबोर्शन करने से इनकार कर दिया है. मैंने कागज़ को उसी तरह मोड़ कर वापस फेंक दिया.

विकास नींबू ले आया. हम दोनों खाना खाने लगे. दाल अच्छी बनी थी. खाते-खाते एकदम जैसे मुँह में कड़वाहट भर गयी. अपनी दाल में नींबू मैंने खुद निचोड़ा था. शायद एक-आध बीज दाल में आ गया था. विकास ने पूछा, क्या हुआ?
कुछ नहीं. नींबू का बीज था शायद, मैंने कहा.
विकास मुस्कराया, मैं जब भी नींबू निचोड़ता हूँ, तो बीज हमेशा निकाल देता हूँ. पूरी सावधानी से. नहीं तो दाल का सारा मज़ा ही खराब हो जाता है.


शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

फूलहिं फलहिं न बेंत

दोपहर के बीतते-बीतते यूँ संवलाये बादलों का अचानक घिर आना कोई नयी बात नहीं है. बल्कि---अच्छा ही तो लगता है. दिन-भर चमकीली धूप के हृदयहीन प्रहारों के बाद ठंडक और गीलेपन का यह सुखद-सुहाना स्पर्श बड़ा मधुर और स्मरणीय अनुभव है. होना तो चाहिए, कम-से-कम.


बाबूजी की कुर्सी बरामदे में रक्खी रहती है. धूप हो, बरसात हो, सर्दी हो या गर्मी. इसका बेंत वर्षों से इस तरह के आकस्मिक और क्रमिक परिवर्तनों का अभ्यस्त हो चुका है. बाबूजी की तरह. लेकिन, बड़ा महत्वपूर्ण अंतर है एक. इस कुर्सी की उपयोगिता कम नहीं हुई है. बाबूजी के जरा-जर्जर शरीर को यह आज भी उसी निर्लिप्त भाव से ग्रहण करती है, जिस भाव से कभी उनके कर्मठ, संघर्षशील शरीर की श्रमजन्य थकान मिटाती थी. और बूंदाबांदी के इस मौसम में कुर्सी पर बैठे इस बूढ़े व्यक्ति की उपयोगिता.....

बादल घिरते आ रहे हैं. हवा में शीतलता व्याप गयी है. तेज़ क़दमों से घर लौटते इक्का-दुक्का आदमी सड़क पर दिखाई दे जाते हैं. ऊपर रोशनदान में चिड़ियों की चीं-चीं का स्वर. घरेलूपन की गर्माहट और सुरक्षा.

कुर्सी की जगह चारपाई भी उपलब्ध हो सकती थी. पर उन्होंने स्वेच्छा से बहुत सारी सुविधाएँ छोड़ भी तो दी हैं. शुरू से ही यही करते आये हैं. बड़े ने जब कभी उनके आराम का या खानपान का ध्यान न रखने के लिए औपचारिकतावश बहू को सामान्य-से शब्दों में भी डपटना चाहा, तभी उन्होंने मुस्करा कर इन सभी सुविधाओं के अनावश्यक ---
बल्कि, हानिकारक ---होने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं.

पर जब वह उनके कपड़ों पर, उन्हें पहनने के ढंग पर आपत्ति करता है, तब शायद कोरी औपचारिकता नहीं होती. आखिर उसके मित्र और मेहमान क्या सोचेंगे, अगर बाबूजी ने कपडे ढंग से नहीं पहने, तो ? यूँ देखा जाए तो यह भी औपचारिकता का ही बदला हुआ रूप है. उनके प्रति न सही, अपने मित्रों के प्रति.

बाहर गीली मिट्टी की गंध वातावरण में भरती जा रही है. आसमान की नीलिमा धुल गयी-सी लगती है. बूँदें बे-आवाज़ झरने लगी हैं. आसपास के मकान अजीब-सी ख़ामोशी में डूब गये हैं.

उनके पास उदास होने के लिए कोई ठोस कारण नहीं हैं. सब कुछ ठीक-ठाक है. बस, एक व्यर्थता के एहसास को छोड़ कर. अपनी व्यर्थता, अपने होने की व्यर्थता. अपने केन्द्र से हटा कर एक कोने में डाल दिए जाने की अनुभूति. अपने अवांछित, अनपेक्षित होने की पीड़ा. मुँह से कोई कुछ नहीं कहता. सभी जैसे कतरा कर चले जाते हैं.

बंटी और हनी अंदर ‘चेस’ खेल रहे हैं. उनकी आवाजें बीच-बीच में उत्तेजित, व्यंग्यपूर्ण, उल्लसित या गर्वित हो जाती हैं. बाबूजी जैसे पूरे वातावरण से असंबद्ध हैं. उनकी उपस्थिति की निरंतरता कोई ध्यान देने लायक बात नहीं है. इधर के कमरे में सुधा को मास्टर साहब कैमिस्ट्री पढ़ा रहे हैं. कैटलिस्ट. रासायनिक क्रिया में इसकी उपस्थिति अनिवार्य नहीं होती. परन्तु यह क्रिया की गति बढ़ा देता है. अर्थात, इसकी उपस्थिति से क्रिया जल्दी पूरी हो जाती है. सारी क्रिया के दौरान इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता. यहाँ भी महत्त्वपूर्ण अंतर है. वे इस घर में, इस परिवार में होने वाली क्रियाओं में कहीं कैटलिस्ट भी नहीं हैं.

बादल बाहर पानी बरसा रहे हैं. पानी, यानी अमृत, सुधा. सुधा इस साल सीनियर सैकंडरी कका इम्तिहान दे रही है. बादल सुधा बरसा रहे हैं. उनकी कुर्सी का बेंत कमज़ोर पड़ गया है. आँगन के पास लटकी बेल की गीली पत्तियां ज्यादा हरी लगने लगी हैं. आसपास जीवन चल रहा है. सब कुछ गति में है. उनके बच्चे, उनके बच्चों के बच्चे फल-फूल रहे हैं. उनकी स्वर्गवासिनी पत्नी रामचरितमानस का नियमित रूप से पाठ किया करती थी. उन्होंने सुना था एक दिन --- “फूलहिं फलहिं न बेंत, जदपि सुधा बरसहिं जलद.”

उनके फलने-फूलने का समय बीत गया. बहुत पहले, कई-कई साल पहले, स्कूल में पंडितजी पढ़ाते थे --- “कालो न यातो, वयमेव याताः.” समय नहीं बीतता, हमीं बीत जाते हैं. शायद वे स्वयं बीत गये. वे पंडितजी भी बीत गये होंगे. उन्होंने अपना बीतना स्वीकार लिया होगा. कुछ भी तो ऐसा नहीं है चारों ओर, जो इस तरह का स्वीकार न मांगता हो; जो बाबूजी के, बाबूजी जैसे अनगिनत व्यक्तियों के बार-बार हठपूर्वक उछाले गये नकार को, विरोध को सहन करता हो. जड़ प्रकृति के क्रिया-कलापों में, समय और प्रारब्ध सरीखी अमूर्त सत्ताओं में भी एक तरह का अप्रतिहत अहं है, एक तरह की अनिवार्यता है.

शतरंज के खेल में गरमा-गर्मी आ गयी है. बंटी की आवाज़ से लगता है, उसका पक्ष कमज़ोर पड़ गया है. उसका बादशाह व्यूह में घिर गया लगता है. बचने के रास्ते जैसे लगातार संकरे होते जा रहे हैं, सिमट रहे हैं. बाहर सड़क पर धुंधलका-सा घिर आया है. बारिश न भी होती, तो यूँ भी शाम को धुंधलका स्वाभाविक रूप से घिरता ही. बाबूजी रिटायर न भी होते तो यूँ भी बुढ़ापा आता. वे बीतते. शतरंज के बादशाह भी बीत जाते हैं. खैर, वह हार-जीत का सवाल है. जीत कर भी, लेकिन, बादशाह मैदान छोड़ जाते हैं. जाते तो हैं, जीत कर या हार कर.

दिन भर कितनी तो गर्मी पड़ी. पसीने की चिपचिपाहट. पपड़ाये होठों की अनबुझ प्यास. भीतर जाने कैसी-कैसी घबराहट. बाहर धूप का विस्तार. छाहौं चाहति छाँह. आइसक्रीम वाले की बन आयी होगी.

सड़क पर जा रहा है आइसक्रीम वाला. पता नहीं क्यों, एक बार रुक कर गुमसुम-सी टपकती बूंदों के बीच वह भर्राये गले से थकी-थकी दयनीय आवाज़ में पुकार उठता है --- “आ...इस्क्रीम !” आसपास के मकानों का एक बार जायजा लेता है. स्पंदन? गति? प्रत्युत्तर? प्रतिक्रिया? कुछ नहीं होता. आवाज़ बेहोश हवाओं की परतों में, बूंदों के पारदर्शी व्यूह में कहीं घिर कर दम तोड़ देती है. गोया सुनसान जंगल में रात की भयावह चुप्पी में किसी भटकी हुई रूह ने फ़रियाद की हो.

बाबूजी सुन रहे हैं, देख रहे हैं. ज़रूर इसके पास आइसक्रीम बची हुई है. यह अभी बीता नहीं है. तो – तो क्या जो बीत गया, वह समय ही था? बंटी खेल में हार कर चुपचाप उठ आया है --- बरामदे में. शायद वे बंटी को पास बुला कर उसे कोई रोचक-सी कहानी सुना सकते हैं. शायद वे भीतर जा कर हनी को गणित का कोई ‘खेल’ सिखा सकते हैं. या, बड़े के साथ किसी विस्तृत, सहृदय बातचीत में उसके ऑफिस का विवरण जान सकते हैं, उसकी मानसिक परेशानियों को समझ कर उसे कोई सुलझा हुआ परामर्श दे सकते हैं. स्नेह से बहू के सिर पर हाथ फेर कर अपने वृद्धत्व का अधिकार-गर्व महसूस कर सकते हैं. या, सिर्फ़ बंटी की पढ़ाई का हालचाल पूछ सकते हैं. शायद वे पुकार कर कह सकते हैं --- “आ....इस्क्रीम !” पर वे इनमें से कुछ भी नहीं करेंगे. पंडितजी सच कहते थे क्या? वे पंडितजी वाले ‘वयम्’ (हम) के एक नगण्य सदस्य हैं या कि, आइसक्रीम अभी बची हुई है?

दोपहर के बीतते-बीतते यूँ संवलाये बादलों का अचानक घिर आना कोई नयी बात नहीं है, बल्कि.....

सोमवार, 11 जनवरी 2010

प्रेम न हाट बिकाय

" 'प्रेम' शब्द के इस्तेमाल पर तो अब कानूनी पाबंदी लग जानी चाहिए !" बहस के दौरान उत्तेजित हो कर महेंद्र ने अपना निर्णय सुनाया था .

लेकिन सर्वप्रीत इसे अंतिम फैसले के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा था . वह बहस जारी रखना चाहता था --" लेकिन 'प्रेम' शब्द के किस मायने में इस्तेमाल किये जाने पर पाबंदी लगाई जाये ? इसका अर्थ तो बड़ा व्यापक है ."

मैंने अपनी आदत के मुताबिक दोनों को संबोधित कर के कहा था--" देखो, डी एच लारेंस ने भी एक जगह ठीक यही पाबंदी लगा देने वाली बात कही है, हालाँकि खुद उसने इस शब्द का जम कर इस्तेमाल किया है ."

यह अतिरिक्त जानकारी थी, पर सर्वप्रीत का सवाल हमारे बीच अभी अनछुआ पड़ा था . जैसे टेबल पर उसके सामने रखा हुआ कॉफ़ी का कप .

कॉफ़ी-हाउस में कल रात यही रोचक बहस हुई थी . महेंद्र का मसीहाई अंदाज़, सर्वप्रीत की सवालों को उघाड़ कर साफ़-साफ़ शब्दों में सबके सामने रखने की आदत और मेरी विद्वत्ता-प्रदर्शन तथा सुलह-समझौता करवाने की प्रवृत्ति --- ये सब मिल कर बहस के लिए अच्छा वातावरण बना देते हैं . यूं बहस में मृत्युंजय, सत्यवीर, अनुपम और सुरेश भी खूब हिस्सा लेते हैं .

मेरे सामने मेज़ पर दो ख़त पड़े हैं. ये दोनों अरविन्द के ख़त हैं. अरविन्द भी हमारी मित्र-मंडली का सदस्य था. डेढ़ बरस पहले उसके पिताजी का तबादला हो गया था . एक ख़त पर तकरीबन आठ महीने पहले की तारीख है. उन दिनों अरविन्द डाक-तार विभाग में क्लर्क था. ऐसे प्रतिभाशाली लड़के को क्लर्की करनी पड़ रही थी, यह बात हम सबको बड़ी खेदजनक लगती थी. पर वह लगातार प्रतियोगिता-परीक्षाओं में बैठ रहा था और इंटरव्यू दे रहा था. उसके भविष्य के प्रति हम लोग ज्यादा चिंतित नहीं थे.

बहरहाल, यह पहला ख़त यूं है---

रवीन्द्र भाई,
आज तुम्हारी यह शिकायत दूर कर ही दूं कि मैं तुम्हें पत्र नहीं लिखता हूँ. पर सिर्फ शिकायत दूर करने के लिए पत्र नहीं लिख रहा हूँ. तुम सोचोगे ज़रूर कोई खास बात है, जो अरविन्द पत्र लिखने बैठा है . ठीक सोचा तुमने !

बात तो खास ही है. समझ में नहीं आता--किस सिरे से शुरू करूँ ? तुम्हें रेखा के विषय में शुष्क तथ्यों पर आधारित जानकारी दे कर बात ख़त्म कर दूं, तो चिट्ठी लिखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा. इतना तो बता ही दूं कि रेखा के साथ मेरी सगाई हो गयी है और मैं बहुत-बहुत खुश हूँ. मैं उस से प्रेम करने लगा हूँ. तुम भी उस से मिलोगे, तो मान जाओगे कि मैं सचमुच बहुत भाग्यशाली हूँ.

इतना मौलिक चिंतन करने वाला आदमी कैसे घिसे-पिटे फ़िल्मी संवाद पत्र में लिख रहा है -- यही सोच रहे हो न तुम ? मेरे भाई, यह प्यार बड़े-बड़े लोगों को ख़ुशी से पागल कर देता है. रेखा बड़ी सादगी-पसंद लड़की है और उसके इस सादगीभरे नारीत्व ने मुझे बहुत प्रभावित किया है. मेरे पिताजी को तो तुम जानते ही हो. कितनी पैनी नज़र है उनकी और कैसा अप्रभावित रहने का स्वभाव. उन्होंने भी कई बार रेखा की खुल कर प्रशंसा की है .

रेखा यह ज़रूर चाहती है कि मैं किसी अच्छे पद पर कार्य करूँ, लेकिन मेरे क्लर्क होने के कारण कोई हीन-भावना उसके मन में नहीं है . तुम तो जानते हो, मैं खुद कितना प्रयास कर रहा हूँ किसी अच्छे पद पर पहुँचने के लिए.

तुम इस तरफ कब आ रहे हो ? तुम्हें रेखा से मिलवाऊँगा . पत्र का उत्तर तो एकदम दोगे ही. माफ़ करना, यार, जल्दी में सगाई हुई; तुम्हें निमंत्रण भी नहीं भेज सका. अब शादी पर तुम्हें ज़रूर पहुंचना है. जल्दी ही तुम्हें निमंत्रण मिलेगा.

अच्छा. महेंद्र, सर्वप्रीत, सुरेश, मृत्युंजय, सत्यवीर, और अनुपम को भी यह खबर सुना देना. कहना-- अरविन्द तुम सब को बहुत याद करता है.

तुम्हारा अपना,
अरविन्द

दूसरा पत्र आज सुबह ही आया है. लेकिन वह पत्र आपको दिखाने से पहले मैं यह बता दूँ कि इन आठ महीनों में क्या हुआ है. हमारी बैठकें कॉफ़ी-हाउस में पहले की तरह जमती रही हैं. इस बीच महेंद्र का पी-एच डी के लिए रजिस्ट्रेशन हो गया है. मृत्युंजय मुंबई में एक सेमिनार में भाग लेने गया था. अनुपमकी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है. और अरविन्द भी दो-एक बार यहाँ आया

पहली बार जब आया, तो उसने बड़ा बोर किया. उसका 'रेखा-पुराण' द्रौपदी के चीर की तरह समाप्त ही नहीं हो रहा था. इतना तो कभी सुरेश की अति बौद्धिक कविताओं ने भी हमें बोर नहीं किया था. मैं मानता हूँ, मुझे अपने मित्र की ख़ुशी में शामिल होना चाहिए. मैं यह भी नहीं कहता कि रेखा के प्रति उसका प्रेम महज़ किशोरावस्था का पागलपन है या किसी अपरिपक्व मस्तिष्क की वायवीय कल्पना-मात्र है. उसका प्रेम गंभीर और सच्चा होगा. इस विषय में मैं अपनी किसी भी तरह की राय को असंगत ही समझता हूँ.

खैर, दूसरी बार वह एक शुभ सूचना लेकर आया. सिविल सर्विसेज़ की प्रतियोगी परीक्षा में वह सफल हो गया था और उसका इंटरव्यू भी अच्छा रहा था. शीघ्र ही वह ऊँचे दर्जे का सरकारी अफसर बनने वाला था. उसने काफी-हाउस में ही अच्छी-खासी पार्टी हम दोस्तों को दी. इस बार उसने रेखा के साथ अपने सुखद भविष्य की योजनाएँ भी बनाईं. वे योजनाएँ यथार्थ से कटी हुई या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं थीं.

इसके बाद मृत्युंजय सेमिनार से लौटते हुए रास्ते में एक दिन अरविन्द के यहाँ ठहरा. उसने आ कर सूचना दी कि इंटरव्यू में भी अरविन्द सफल रहा था. मुझे, दर असल, उसके विवाह के निमंत्रण-पत्र की प्रतीक्षा थी. मुझे आशा थी कि प्रोबेशन पर जाने से पहले वह विवाह कर लेगा.

और आज सुबह यह दूसरा पत्र आया है ---

रवीन्द्र भाई,

तुम सोचते होगे -- कम्बख्त अच्छी-खासी नौकरी पर लगा है; शादी न जाने कब करेगा ? ठीक है . इसी महीने शादी कर रहा हूँ. औपचारिक निमंत्रण-पत्र अलग से भेजूंगा.

तुम्हें कल्पना के बारे में तो नहीं बताया न ? बताता भी कैसे ? अभी एक सप्ताह पहले तो उस से परिचय हुआ है. उसके पापा पिताजी के एक मित्र के मित्र हैं. बस, पिताजी से उन्हों ने मेरे बारे में बात की. पिताजी को कल्पना पसंद है. उसके साथ विवाह से दो दिन पहले सगाई की रस्म भी हो जायेगी. मुझे भी कल्पना बड़ी समझदार और सुलझी हुई लड़की लगी. दिल्ली के एक कॉलेज में समाज-शास्त्र की प्राध्यापिका है. उसके पापा यहाँ के प्रतिष्ठित वकीलों में से हैं.

रेखा के बारे में जानना चाहते हो तुम ? बस, मामला कुछ जमा नहीं. पिताजी उसके पापा के साथ कुछ ज़रूरी बातें करने गए थे. यही विवाह के सिलसिले में. उन्होंने लौट कर बताया कि ज्यादा उत्साहवर्धक 'रिस्पौंस' नहीं मिला. इसके बाद आगे बढने का तो सवाल ही नहीं था.

कल्पना मुझे खूब पसंद है. बल्कि, मैं उस से प्यार करने लगा हूँ. मुझे ऐसी ही जीवन-संगिनी की तलाश थी. अच्छा, मुझे अभी सूट की सिलाई के लिए टेलर के पास जाना है. घर पर सबको यथोचित अभिवादन. मित्र-मण्डली को तो मैं प्रायः याद करता रहता हूँ.

तुम्हारा अपना,
अरविन्द

शाम हो रही है. मैं यह दूसरा पत्र चुपचाप जेब में डाल कर कॉफ़ी-हाउस की तरफ चल पड़ता हूँ. आज पहली बार मैं एक मित्र के व्यक्तिगत पत्र को टेबल पर अन्य मित्रों के सामने रखूँगा और चाहूँगा कि इस पर चर्चा हो.

कॉफ़ी-हाउस में सब पहुँच चुके हैं. मैं जेब से पत्र निकाल कर टेबल पर रखता हूँ. पत्र का पोस्ट-मार्टम होता है. सुरेश कहता है -- " इतना स्पष्ट है कि अरविन्द अगर सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा में अच्छे अंक ले कर सरकारी अफसर न लगा होता, तो कल्पना के पापा की ओर से रिश्ता कभी नहीं आता और रेखा के साथ उसकी मँगनी बिलकुल नहीं टूटती."

सत्यवीर को भी रेखा के साथ सहानुभूति है. वह बताना चाहता है कि ऐसी घटनाएँ प्रायः होती हैं, लेकिन हमारा एक मित्र पैसे के लालच में ऐसे सम्बन्ध को तोड़ दे --- यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. वह इसे साफ़-साफ़ दहेज के लालच का मामला मानता है.

अनुपम का कहना है -- " यह सरासर अन्याय है. जब प्यार करने के बाद अरविन्द ने शादी करना ज़रूरी नहीं समझा, तो शादी करते समय कल्पना से प्यार करना ज़रूरी क्यों समझता है वह ?"

मुझे सर्वप्रीत का वह सवाल अचानक याद आ गया है --" 'प्रेम' शब्द के किस मायने में इस्तेमाल किये जाने पर पाबंदी लगे जाये ?" मैं सबको वह बात याद दिलाता हूँ और महेंद्र अपने उसी निर्णयात्मक लहजे में बोल उठता है -- " ठीक है. यह सर्वप्रीत के सवाल का आंशिक जवाब है. कम-से-कम इस मायने में 'प्रेम' शब्द के इस्तेमाल पर पाबंदी लग ही जानी चाहिए, जिस मायने में अरविन्द ने इसे इस पत्र में इस्तेमाल किया है. यह बिलकुल झूठ है. वह प्यार नहीं करता है. वह प्यार करने के लिए खुद को तैयार कर रहा है, मना रहा है."

यही आत्म-प्रवंचना, मेरी नज़र में, असली त्रासदी है. रेखा की सगाई टूट जाना दुःख की बात है. अरविन्द जैसे क्रान्तिधर्मा नवयुवक का समय आने पर पिताजी के दड़बे में दुबक जाना और इस तरह रेखा को धोखा देना उससे भी ज्यादा दुःख की बात है. पर यह अपने आप को धोखे में डालने की कोशिश बड़ी पीड़ादायक स्थिति है. और इस से बुरी सिर्फ एक बात हो सकती है.
वह यह कि कल महेंद्र, सर्वप्रीत, मृत्युंजय, सत्यवीर, अनुपम, सुरेश और खुद रवीन्द्र में से कोई अरविन्द के इस दुसरे पत्र जैसा पत्र किसी को लिखे !

सोमवार, 2 नवंबर 2009

दंगा-राहत

मंजीत ने अपना वादा पूरा किया था। आज उसकी चिट्ठी मिलने से पुनीता के उदास चेहरे पर ख़ुशी लौट आयी थी. ममी लॉन में कुर्सी डाल कर बैठी स्वेटर बुन रही थीं. साथ ही सोच रही थीं कि सहेली का पत्र मिलते ही पुनीता कैसे उड़ान भरते पक्षी की तरह उत्साह से भर गयी है, चहक रही है. उन्हें अपना बचपन याद आ गया. उनकी स्कूल-कॉलेज की सहेलियां सब अलग-अलग हो गयीं थीं. सभी अपने-अपने घरों, बच्चों और नौकरियों में व्यस्त होंगी. एक उसांस छोड़ कर वे फिर से बुनने लगीं. उधर अमृतसर से उनके देवर देव शरण की भी एक चिट्ठी आज आयी थी. वह परिवार-सहित हरियाणा में आ कर बसना चाहता था. इस विषय में बड़े भाई से सलाह-मशविरा करने वह चार-पाँच दिन में आने वाला था. बुनते-बुनते ममी के चेहरे पर चिंता और परेशानी के बादल घिर आये.
अचानक पुनीता गेट की ओर भागी--"पापा आ गए! ...पापा! आज दो चिट्ठियां आयीं हैं-- मंजीत की और चाचा जी की। मंजीत परसों वापिस आ रही है." अपने मन का उल्लास वह पापा के साथ बांटना चाहती थी. पापा गेट खोल कर अन्दर आये, तो उनके चेहरे पर अजीब-सा तनाव था. वे बहुत परेशान और चिंतित दिखाई दे रहे थे.
इससे पहले कि ममी कुछ पूछें, वे खुद ममी के निकट आ कर बोले--"कुछ सुना तुमने? सुनने में आया है कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी।"
ममी अविश्वास से उनकी ओ़र देखती रह गयीं। फिर बोलीं--"किसने कहा आपसे? क्या रेडियो पर सुना है?" पुनीता का सारा उल्लास काफूर हो गया. "पुनीता, ज़रा अन्दर से ट्रांजिस्टर तो लाना. समाचार सुनने से पक्का पता चलेगा." पापा यह कहते हुए लॉन में कुर्सी पर बैठ गए.
धीरे-धीरे दिल्ली की घटनाओं के बारे में उड़ती-उड़ती खबरें पहुँचने लगीं. अगले दिन तक मंजीत, नोनू और उनके ममी-पापा के बारे में पुनीता को कुछ पता नहीं चला. वे सब ठीक-ठाक हैं या नहीं--यह चिंता उसके मन में बढती जा रही थी. रात को सोने से पहले वह पापा से खूब बातें करना चाहती थी, पर पापा अब कम बोलने लगे थे. जैसे-जैसे खबरें आतीं, वे ज्यादा गंभीर होते जाते. पुनीता बार-बार उनके नज़दीक आती. उसे ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी बंद दरवाजे की ओर बार-बार जाती है, लेकिन उसे खटखटाती भी नहीं, क्योंकि उस पर ताला लगा है.
"पापा! मंजीत के ममी-पापा अब तक वापस नहीं आये। उन्हें कुछ हुआ तो नहीं होगा?" पुनीता ने पापा के चेहरे की तरफ यूं देखा, जैसे उनके आश्वासन से ही सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। उधर पापा के भीतर जो कुछ बर्फ की तरह जमा हुआ था, वह पुनीता के मंजीत और उसके परिवार के प्रति सहज-सच्चे लगाव की गर्माहट से धीरे-धीरे पिघलने लगा-- "पुनीता, कल रात जब तुम सोने से पहले प्रार्थना कर रही थीं, तब मैं आँखें बंद कर के लेटा हुआ था ना? मैंने तुम्हारी प्रार्थना के शब्द सुने थे। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी प्रार्थना से अगर मंजीत, नोनू और उनके ममी-पापा यहाँ सकुशल लौटते हैं, तो ऐसा ही हो। पर मुझे दो-तीन दिन से ऐसा लग रहा है कि शुभकामना या प्रार्थना अच्छी होते हुए भी काफी नहीं है । इससे आगे भी कुछ करना ज़रूरी है।"
"जैसे कोई बड़ा बलिदान?" पुनीता का सवाल था ।
"देखो, बेटे! बड़ा बलिदान करने के मौके तो ज़िन्दगी में थोड़े-से ही होते हैं। अगर हम रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें, तो उसीसे बड़ी-बड़ी मुश्किलें हल हो सकती हैं।"
"पापा! सब का सोचने का तरीका भी तो अलग-अलग होता है ना ? इससे भी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।"
"नहीं, बेटे ! इससे मुश्किलें खड़ी नहीं होतीं. बल्कि यह तो अच्छी बात है. खैर, वह सब तुम्हें फिर कभी समझाऊंगा . फिलहाल तो हमें...."
"मंजीत के बारे में पता लगाना चाहिए," पुनीता ने जल्दी से पापा का अधूरा वाक्य पूरा किया।
"हाँ, बेटे ! मुझे भी आज चिंता हो रही है. कल दोपहर तक अगर वे नहीं आये, तो टेलीग्राम भेज कर पता करेंगे. "सुनो, मंजीत की चिट्ठी में वहां का फोन नंबर लिखा है क्या ?"
"नहीं, पापा. फोन नंबर तो नहीं है. बस, पता लिखा हुआ है."
पापा का ध्यान देव शरण की ओर चला गया . उसका हरियाणा में किसी स्थान पर आ कर रहना लगभग तय हो चुका था .यह निर्णय भी कोई आसान नहीं था . पापा सोच रहे थे कि देव शरण के साथ वे क्या बात करेंगे ? क्या कहेंगे उसको ?
यह मंजीत ही तो थी, जो पुनीता के सामने खड़ी थी . वही आँखें थीं, पर वैसी नहीं थीं . वही चेहरा था पर वैसा नहीं था . थोड़े-थोड़े शब्द उसके मुंह से निकलते थे, पर वह ऐसा कुछ नहीं बोल रही थी कि "पागल है तू तो !"जो भी वह कहती या करती थी, उसमें स्वयं मौजूद नहीं होती थी . ज़रूर पिछले चार दिनों में ही सब कुछ हुआ था . पुनीता को ठीक-ठीक मालूम नहीं कि क्या हुआ था . वह मंजीत के घर से लौटते हुए विचारों में खोई हुई थी . मंजीत के ममी-पापा सकुशल घर आ गए थे-- इस बात से उसके मन को बड़ी राहत मिली थी . पर उन सब का व्यवहार उसे पहेली की तरह लग रहा था . शायद पापा कुछ बता सकें .
पापा मंजीत के 'दारजी' से मिलने के लिए घर के गेट से बाहर निकल रहे थे । बाहर पड़ोस के घर की दीवार के साथ नोनू अपने दोस्त संजू के साथ बातें करने में खोया हुआ था . छोटी-सी गेंद उसके हाथ में थी . खेलते-खेलते शायद वे बातों में ज्यादा रुचि लेने लग गए थे . संजू बालसुलभ गर्व के साथ बता रहा था -- "'दिल्ली में ना मेरे मामा जी रहते हैं .उनके घर में ना एक खरगोश था . एक दिन पता है क्या हुआ ? दोपहर को बिल्ली ने उसको मार दिया ." नोनू का ध्यान संजू के पहले वाक्य में ही अटक गया लगता था . जैसे वह भी संजू से कुछ कम नहीं था, इस अंदाज़ में बोला -- "दिल्ली में तो मेरी नानी भी रहती हैं . और पता है ? मेरे तो नाना जी भी नहीं मरे ।"
पापा के कदम ठिठक गये . मंजीत के नाना-नानी के बारे में जान कर आश्वस्त तो हुए, लेकिन उनके न मरने की खबर से मिली राहत ने भी उन्हें सोचने पर विवश कर दिया .

क्या अब हम ऐसी राहतों के सहारे जिंदा रहेंगे ? आखिर हम ऐसा क्यों होने देते हैं बार-बार ?

बुधवार, 4 मार्च 2009

अपराधी

पार्क में पेड़ प्रतीक्षा कर रहे हैं और पौधे बालकों की तरह ठुनक रहे हैं। इन दिनों पेड़ पौधों को तीखी भूख लगने से पूर्व ही, पूर्व दिशा से उभर कर आने वाली सुनहरी थाली सामने जाती है। फिर भी उन्हें आहार की प्रतीक्षा तो रहती है। इधर निकुंज बाबू अपने घर से निकल पड़े हैं। सुबह सवेरे घर के भीतर बैठे रहने से उन्हें भी पौधों जैसी ही बेचैनी होने लगती है। उन्हें अपने बीच पा कर पेड़- पौधे आश्वस्त होते हैं। उनका आहार उन्हें मिलता है तो वे खिलखिलाते हैंइन दिनों यानि मार्च-अप्रैल में वे खूब खिलखिलाते हैं। निकुंज बाबू अपने नितांत निजी संसार में पहुंचे हैं। गिलहरियाँ, चिड़ियाँ, तोते, गुलाब, गेंदा और ऐसे अनेक फूल और परिंदे जिनके नाम उन्हें मालूम नहीं हैं - इन सब के बीच इन के साथ अपने विशेष रिश्ते का एहसास उनका भी संबल है। उसी तरह जैसे बालकों-से ठुनकने वाले पौधों को रोज़ सुबह उनका इंतजार रहता है।
निकुंज बाबू के दिन की इस शुरुआत से ऐसा समझें कि यह वरिष्ठ नागरिक दुनिया की सच्चाइयों से बेखबर रहता होगा। बल्कि उनकी दिनचर्या का अगला कदम अख़बार पढ़ना ही है। बहरहाल, अप्रैल के जिस दिन का हम ज़िक्र कर रहे हैं, वह और दिनों कि अपेक्षा कुछ ज़्यादा ही यादें लेकर आया है। उस ज़माने की यादें जब उनकी ज़िन्दगी घटनाओं और एक्शन से भरपूर थी। अब यह भी उन्हें याद नहीं रहा कि स्मृतियों की इस बरसात की पहली बूँद ने कैसे उन्हें छुआ था। दिमाग़ पर थोड़ा ज़ोर दे कर सोचा तो उन्हें याद आया कि अख़बार पर तारीख पढ़ते हुए उनकी यादों में जीवन के वसंत का वह दिन लौट आया जब वे स्कूल में पढ़ते थे। उनकी कक्षा में गरिमा नाम की एक लड़की थी, जिसका नाम बताने का वैसे कोई मतलब नहीं, क्योंकि इस नाम से उन्होंने उसे कभी बुलाया ही नहीं। वे तो हमेशा उसे 'मोटी' ही पुकारते थे। ऐसे नामों के लिए कोई तर्क हो भी सकता है, पर अक्सर ये यूँ ही व्यक्तित्व को परिभाषित-सा करने वाले चिढ़ाने के निश्चित तरीके के रूप में इस्तेमाल होते हैं। गरिमा इस नाम से ख़ास तौर पर इसीलिए चिढ़ती भी थी।
एक बार उसने निकुंज से एक किताब मांग कर ली। तीन दिन बाद जब पुस्तक वापस आयी, तो भीतर के मुखपृष्ठ पर छपे हुए कुछ अक्षरों के नीचे पेंसिल से लिखी कुछ संख्याओं पर निकुंज की नज़र पड़ी। एक से चौदह तक। यह कोई संकेत या संदेश था। संख्याओं के क्रम से उसने अक्षरों को जोड़ा। संदेश अंग्रेज़ी में धन्यवाद का था, यानी टी-एच--एन-के-एस-टी--एन-आई-के-यू-एन-जे, 'निकुंज को धन्यवाद' इसके लगभग दो सप्ताह बाद की बात है। निकुंज ने नोट-बुक में एक पृष्ठ खोल कर गरिमा की ओर वह नोट-बुक बढाई। "क्या है?" उसने पूछा। "ख़ुद देख लो। आज मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा के लिए एक नया रोचक खेल लाया हूँ।" गरिमा ने देखा - सामने पृष्ठ पर कुछ खाली वर्गाकार आकृतियाँ कतार में बनी हुई थीं और उन रिक्त स्थानों के ऊपर अलग-अलग संख्याएँ लिखी हुई थीं---१६-१८--१२--१५-१५-१२। तर्कहीन, बिना किसी क्रम के। निकुंज ने अनुभव किया कि थोडी उत्सुकता जाग रही है, तो आगे बोला, " इन रिक्त स्थानों को भर सको, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं तुम्हें क्या बनाना चाहता हूँ।" फिर दो क्षण रुक कर बोला, " तुम्हारी मदद के लिए एक संकेत दूं?" इस तरह चुनौती के बाद प्रलोभन भी प्रस्तुत कर दिया। कुछ देर सोचने के बाद गरिमा ने पूछा, " हाँ, बताओ। बस, संकेत करना; उत्तर मत बताना।" " देखो, इसका तरीका कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा तुमने मेरी इंग्लिश की रीडर के टाइटल पेज पर अपनाया था।" फिर थोड़ा रुक कर उसने जोड़ा, " मैंने तो एकदम इसका उत्तर खोज लिया था।" गरिमा को चिढाने के लिए इतना काफी था। आज निकुंज इतना सचेत था कि उसे 'मोटी' कह कर बुलाने से बच रहा था। लेकिन इस बात पर गरिमा का ध्यान ही नहीं गया। पेंसिल लेकर वह खाली स्थान भरने में जुट गई। तरीका सीधा-सादा था--'एक' के लिए '', 'दो' के लिए 'बी', 'तीन' के लिए 'सी' और इसी तरह 'छब्बीस' के लिए 'ज़ेड' इस तरह अक्षर भरने थे। इस बीच निकुंज ने कहा कि इन वर्गों को क्रम से भरना ज़रूरी नहीं है, तो गरिमा का काम और भी आसान हो गया। लेकिन एक बार सारे अक्षर भरने के बाद उसने जो पढ़ा, तो -पी-आर-आई-एल-ऍफ़---एल यानी 'april fool' पढ़ते ही वह उसी पेंसिल को हथियार बना कर निकुंज की ओर लपकी, लेकिन वह 'मोटी', 'मोटी' कह कर उसे चिढ़ाता हुआ भागा ज़्यादा दूर नहीं, क्योंकि पीछे मुड़ कर उसे गरिमा का गुस्से से भरा चेहरा, हंसी और नाराज़गी के मिले-जुले भाव व्यक्त करती उसकी आँखें भी तो देखनी थीं।
बात तो छोटी-सी थी, पर निकुंज को उन आँखों में गुस्सा कुछ ज्यादा और हंसी बहुत थोड़ी दिखाई दी। फिर उसने निकुंज को कुछ ऐसा कह दिया, जिसे वह आज तक भूल नहीं पाया है। " यही बनाओगे तुम मुझे! और तुमसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है ?" यूँ कहा गया, मानो अपने आप से कहा हो। इसके बाद वह पांच-छः रातों तक ठीक से सो नहीं पाया था। गरिमा की आँखों का वह अचानक बुझा-बुझा भाव और उसकी वह निराशापूर्ण आत्मालाप जैसी टिप्पणी उसके मन को कई दिनों तक पल-पल सालते रहे।
इससे पहले भी एक बार खेल-खेल में उसने कुछ बच्चों के साथ मिल कर एक योजना बनाई थी। दरअसल, रोहित को कचरे के ढेर में लोहे का एक खोल मिला था, जिसके आगे लेंस लगा था। संभवतः किसी वाहन के आगे रोशनी के लिए बनाया गया होगा। बच्चों ने उसे अपनी कल्पना से कैमरा मान लिया। फिर निकुंज ने योजना बनाई, जिसके अनुसार गरिमा को बुला कर वह जादू का कैमरा दिखाया गया। थोड़ी-सी कोशिश से निकुंज ने उसे फोटो खिंचवाने के लिए तैयार कर लिया। वह कुर्सी पर बैठी और रोहित अपने 'कैमरे' के साथ उसके सामने छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। निकुंज कुर्सी के पीछे था और तीन-चार लड़के-लड़कियां जादू का खेल देखने के लिए मौजूद थे। कैमरे में कुछ क्षण झाँकने के बाद योजना के अनुसार रोहित ने कहा, " गरिमा, तुम ज़रा एक बार खड़ी हो जाओ और कैमरे के लेंस पर नज़र टिकाये रखो। " गरिमा ने निर्देश का पालन किया। " ठीक है," रोहित बोला, " अब तुम इसी तरह लेंस पर नज़र टिकाये हुए बैठ जाओ।" ज्यों ही गरिमा ने बैठना चाहा, धड़ाम से फर्श पर गिरी, क्योंकि कुर्सी निकुंज ने पीछे से चुपचाप खिसका ली थी। फिर तो 'मोटी', 'मोटी' का शोर हुआ और बच्चों ने हँस-हँस कर इस तमाशे का खूब आनंद लिया। उस दिन भी गरिमा ने गुस्से से आँखें तरेर कर निकुंज को देखा था। हँसते-हँसते अचानक वह चुप-सा हो गया था। उन आँखों के दर्द और अपमान के भावों ने उसे तीन-चार रातों तक सोने नहीं दिया
'एप्रिल फूल' वाली घटना के बाद एक और छोटी-सी घटना हुई थी, जो पहले वाली घटनाओं की तरह योजनाबद्ध नहीं थी, बल्कि अचानक हो गयी थी। स्कूल में वार्षिक समारोह की तैयारी पूरी हो चुकी थी और कार्यक्रम की अंतिम रिहर्सल प्राचार्य के सामने प्रस्तुत करने के लिए सब बच्चे तैयार थे। नीली फ्राक और सफ़ेद ब्लाउज में गरिमा खुश थी। टीचर से अनुमति लेकर वह पानी पीने नल की ओर गयी, तो वहां निकुंज खड़ा था। जैसा बच्चे अक्सर करते हैं, पानी पीकर गरिमा ने पानी के छींटे उसके कपडों पर डाल दिए। निकुंज के हाथ में एक फाउंटेन पेन था, जो उसे दो दिन पहले ही उपहार में मिला थाउसने आव देखा ताव, तुंरत प्रतिशोध के लिए नीली स्याही के छींटे गरिमा के कपड़ों पर डाल दिए। बाद में टीचर के बार-बार पूछने और डांटने पर भी उसने निकुंज का नाम नहीं बताया था। पर उसकी आँखों में जो खामोशी और पीड़ा का भाव था, वह इतना मर्मस्पर्शी था कि निकुंज उन आँखों के बिम्ब को महीनों तक मन से हटा नहीं पाया था। उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। उस दिन के बाद उसने कभी गरिमा को 'मोटी' नहीं कहा। कहता भी तो कैसे ? गरिमा ने तो उसके बाद उससे कभी बात ही नहीं की।
उस दिन को याद कर के निकुंज बाबू की आँखें सजल हो आयीं। यह अचरज की बात थी। इस घटना को आधी सदी से भी ज्यादा अरसा हो गया था। अगर वह किसी को यह सब सुनाएँ, तो आज उनकी आँखों का सजल होना कोरी भावुकता ही कहलायेगा। पर उनके मन में चुभे हुए कांटे की-सी यह पीड़ा पुरानी पड़ती ही नहीं।
निकुंज बाबू के हाथ में अख़बार अभी तक यूं ही था। इसी पर अप्रैल की तिथि पढने के बाद वे यादों में खो गए थे। अपने आप को ज़रा सँभाल कर उन्होंने अख़बार की ख़बरों पर सायास ध्यान केन्द्रित करना चाहा। तीसरे पृष्ठ पर एक समाचार ने बरबस उनका ध्यान आकृष्ट किया। किसी युवती को राह चलते रोक कर एक युवक ने उसके चेहरे और कपड़ों पर तेजाब डालने का प्रयास किया था। निकुंज बाबू सोच में डूब गए। स्याही और तेजाब में फ़र्क होता है, लेकिन फ़र्क सिर्फ पीड़ा, नुकसान या अपमान का ही नहीं होता। वह तो सब की समझ में ही जाता है। एक और बहुत महीन अंतर भी होता है। कोरी भावुकता से बच कर रहना एक स्थिति है और निहायत संवेदनहीन हो जाना दूसरी स्थिति। व्यवहार में हम दोनों का अंतर नहीं बनाये रख सकते हैं। हमें देखना चाहिए कि हम सजल आँखों वाली भावुकता से बचे रहने की सावधानी में अनजाने ही भीतर से बिलकुल निर्मम और संवेदनारहित तो नहीं होते जा रहे हैं। निकुंज बाबू उस अपराधी युवक की बात फिलहाल नहीं सोच रहे हैं, जिसे अपराधी के रूप में पहचान लिया गया है। वे तो हमारे-आपके जैसे उन लोगों की बात सोच रहे हैं, जो अख़बार से मिली इस सूचना को ग्रहण करेंगे और किसी भी तरह की भावुकता से बच कर रहेंगे।