यह ग़ज़ल गाने के लिए नहीं रची गयी; तत्सम शब्दों और संयुक्ताक्षरों के कारण संभवतः गेय नहीं बन पायी, फिर भी इस के छंद-विधान आदि पर आपकी टिप्पणियों का स्वागत है ।
भीतर भी घिरता आता है बाहर जो फैला धुंधलापन ।
धुंधलेपन-सा मेरा जीवन, मेरे जीवन-सा धुंधलापन ।
सूर्यातप से दृश्य-जगत पर से परदे जब उठ जाते हैं,
तब खिसिया कर कहाँ फेर मुँह खो जाता गहरा धुंधलापन ?
प्रायः अस्थायी होता है संध्या का झुटपुटा चतुर्दिक
सदा अनिर्णय-सा मेरे मन पर छाया रहता धुंधलापन ।
अस्पष्टता जहाँ जा कर छँटती, पराजिता हो जाती है,
वहाँ पहुँचने से पहले हठपूर्वक ठहर गया धुंधलापन ।
नहीं बनाता केवल मेरी आँखों को ही यह असहाय,
स्पर्श, गंध, रस, स्वर को भी अग्राह्य बना देता धुंधलापन ।
अन्वेषण की प्रबल एषणा और हमारी जिज्ञासाएँ ---
एक ओर ये और दूसरी ओर यह भला क्या ? धुंधलापन ।