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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

तौलिया बोला

(एक झकाझक साफ़-सुथरा तौलिया शोरूम से निकला और बाथ-रूम में नहीं पहुंचा. बल्कि वह यक-ब-यक ऐसी हालत में देखा गया कि पानी-पानी हो गया. ऐसा लगा मानो खुद को ढकने के लिए कोई तौलिया ढूँढ रहा हो. दर-असल हुआ यूँ कि टीवी के बीसियों कैमरों की चुंधियाती रोशनियाँ उस पर पड़ राही थीं और उसे किसी घोटालेबाज की पहचान छिपाने के लिए अदालत में ले जाया जा रहा था. ऐसे में बेचारे तौलिए ने क्या बयान दिया? पढ़िए इस छोटी-सी कविता में. --- दिनेश दधीचि)

तौलिया बोला—“सभी के काम आता हूँ.

ढाँपता हूँ, पोंछता हूँ, मैं सुखाता हूँ.

सोचने का काम तो इन्सान करता है.

सोचना उसका मुझे हैरान करता है.

इतनी हलचल हडबडाहट किस लिए आखिर?

कैमरों की चौंधियाहट किसलिए आखिर?

मैं भी हूँ पतलून कोई, कोट, शर्ट, कमीज़?

देखिये, कुछ सोचिये, मैं तौलिया नाचीज़.

यूँ अदालत में न ले कर जाइए मुझको.

कम-से-कम कुछ काम तो बतलाइये मुझको.

कौन-सा मुझको करिश्मा कर दिखाना है?

फैसला कीजे, मुझे किस काम आना है?

ढाँप कर चेहरे कभी थकता नहीं हूँ मैं.

कारनामे पोंछ पर सकता नहीं हूँ मैं !”

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

यह सब कैसे होता है ?

तुम जानते हो---- यह सब कैसे होता है?
कैसे भीड़ पहली बार
ऐसी घटना से उत्तेजित होती है
विरोध में नारे लगते हैं
जुलूस निकलते हैं.
घटना फिर होती है ---
इस बार शिष्ट-मंडल जुटते हैं
बहसें-चर्चाएं होती हैं.
घटना एक बार फिर होती है
किसी और स्थान पर
किसी और समय पर
थोड़े-से परिवर्तन के साथ.
अब की बार, कॉफी की चुस्कियों के साथ
बुद्धिजीवी उसके बारे में बात करते हैं.
अखबार में सुर्ख़ियों से उतर कर
वह छोटे-छोटे कालमों में
सिकुड जाती है
और इस तरह प्रतिक्रियाएं
ठंडी पड़ने लगती हैं
उत्तेजना मरने लगती है
उस पर बासीपन की परतें जमती जाती हैं.
हम यह कहना छोड़ देते हैं
कि अमुक घटना सनसनीखेज
या खतरनाक है .
या कि अमुक स्थिति
बड़ी शर्मनाक है.
आहिस्ता-आहिस्ता हमें
‘अन्याय’ को ‘न्याय’ कहना
ज़्यादा मुनासिब लगने लगता है.
हमारी तर्क करने की पद्धति बदल जाती है.
हम पूछते हैं—‘ठीक है, ऐसा हुआ.
पर क्या यह भ्रष्टाचार है?’
हत्या को हम आत्महत्या मान लेते हैं
या उससे भी आगे बढ़ कर
महज़ दुर्घटना.
आदर्शों पर बहस करने वाली
पीढ़ी तो बुढा गयी.
अब तो उन पर हँसने वाली पीढ़ी
आ चुकी है.
पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम स्वयं
अपना अवमूल्यन करते जा रहे हैं.
नामालूम ढंग से
चुपचाप, आहिस्ता-आहिस्ता.
इस खौफनाक प्रक्रिया को देख रहे हो तुम?
आक्रोश विस्मय अफ़सोस
रोमांच करुणा सरोकार
ये सब कैसे बर्फ़ की मानिंद
जमते चले जाते हैं
माहौल के शून्य डिग्री तापमान वाले
इस आत्मघाती ठंडेपन में?
तुम जानते हो--- यह सब कैसे होता है?