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रविवार, 6 जून 2010

बारिश आने ही वाली है

बारिश आने ही वाली है .

तपी हुई थी धरती ऐसे
तवा आग पर रक्खा जैसे
तभी हवा का झोंका आया
चला किधर से? आया कैसे?

वह देखो तो आसमान पर
घिर आयी बदली काली है .

गर्मी का इलाज करने को
मन की बेचैनी हरने को
बादल के रथ पर आयी है
खेतों में पानी भरने को .

पेड़ झूमते हाथ हिलाते
झुकी हुई डाली-डाली है .

बारिश आने ही वाली है !

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

बिजली क्या है, जादू है बस

बिजली क्या है, जादू है बस .

घुप्प अँधेरे में जब आँखें
बिलकुल बेबस हो जाती हैं
सारी चीज़ें काली चादर
के अन्दर जब खो जाती हैं

बल्ब जले तो मिट जाता है
आँखों का सारा असमंजस .

पंखा फ्रिज टीवी या मिक्सी
कूलर एसी या कम्प्यूटर
चलते हैं बिजली के बूते
आज दिखाई देते घर-घर .

हरफनमौला बिजली के बिन
नहीं हो सकेंगे टस से मस .

बिजली क्या है, जादू है बस .

रविवार, 7 मार्च 2010

नुक्कड़ वाली तुलसी बाई

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक बाल-कविता

पैंट कमीज़ें और साड़ियाँ
ले जाती है तुलसी बाई
कपडे सभी इस्तरी करके
लौटाती है तुलसी बाई .

छोटा कद है, रंग साँवला
माथे पर बिंदी है लाल
अपने छोटे बच्चों का भी
रखती है वह खूब ख़याल .

हिम्मत से है किया सामना
जब भी कभी मुसीबत आयी .
बड़ी मेहनती नारी है यह
नुक्कड़ वाली तुलसी बाई .

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

शब्दों का खेल

एक फूल के आगे फल है
दोनों मिल कर बने मिठाई .
है 'गुलाब-जामुन' वह काला
गोरे रसगुल्ले का भाई .

जो फँस जाता वह 'शिकार' है,
तैरे जल के बीच 'शिकारा' .
निकले जिस से धुन 'सितार' है,
चमके नभ के बीच 'सितारा' .

क्यों हम 'हार' नहीं पहनाते
उसको, जो चुनाव में 'हारा' ?
इस गड़बड़ घोटाले में है
यह भी एक सवाल हमारा !

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

धूप ज़रा मुझ तक आने दो

धूप ज़रा मुझ तक आने दो !

सुनो, शीत से काँप रहा हूँ
तन बाँहों से ढाँप रहा हूँ
कैसे राहत मिल सकती है
सूरज से मैं भाँप रहा हूँ ।

नहीं मूँगफली भुनी हुई, बस
थोड़ी गरमाहट खाने दो ।

कब से आगे खड़े हुए हो
बीच में आ कर अड़े हुए हो
खूब समझते हो सारा कुछ
फिर भी चिकने घड़े हुए हो ।

ऐसा क्या है ? मान भी जाओ,
जाने दो, यह ज़िद जाने दो ।

खरी बात, फ़रियाद नहीं है
क्या तुमको यह याद नहीं है ?
धूप हवा सब के साँझे हैं
यह कोई जायदाद नहीं है !

किस्सा ख़त्म करो, अब मुझको--
भी अपना हिस्सा पाने दो ।

धूप ज़रा मुझ तक आने दो ।

रविवार, 22 नवंबर 2009

आज भला मैं क्यों उदास हूँ ?

आज भला मैं क्यों उदास हूँ ?

पहना नया गरारा मैंने
'भैया, सुनो' पुकारा मैंने ।
बोले, 'होम वर्क है करना,
डांट पड़ेगी मुझको वरना।'

नहीं देखते मुझको बिल्कुल,
मैं बस उनके आसपास हूँ ।
इसीलिये तो मैं उदास हूँ ।

पापा को दफ़्तर जाना था
काम बहुत सा निबटाना था ।
मम्मी खड़ी रसोईघर में
पड़ी नाश्ते के चक्कर में ।

वैसे दोनों कहते हैं, मैं--
उनके जीवन की मिठास हूँ ।
फिर भी देखो, मैं उदास हूँ !

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

चमक-दमक

बाज़ारों में चमक-दमक है ।
जिधर देखिये बस रौनक है ।

नए-नए चैनल टी वी पर
हर पल रहे बदल टी वी पर ।

हर दफ्तर में मेज़ के ऊपर
रक्खा रहता है कम्प्यूटर ।

पहले तो होती थी फाइल
हाथों में अब है मोबाइल ।

बिजली की तारें ज़्यादा हैं ।
सड़कों पर कारें ज़्यादा हैं ।

पीं पीं पीं पीं पों पों पों है ।
हर कोई जल्दी में क्यों है ?

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

आसमान की सैर

आसमान की सैर करेंगे ।

लन्दन औ' पेरिस जाना तो
बात पुरानी लगती है ।
अमरीका की धरती भी
जानी-पहचानी लगती है ।

अब तो किसी नयी दुनिया की
सैर हमारे पैर करेंगे ।

इस धरती पर रहते-रहते
कर ली है भरपेट लड़ाई ।
रॉकेट में जाने से पहले
आओ, हाथ मिला लो, भाई ।

चलो, कसम खाते हैं, अब हम
नहीं किसी से वैर करेंगे ।
आसमान की सैर करेंगे !

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

सवाल

पक कर सेब गिरा डाली से

आया नीचे धरती पर ।

"ऐसा क्यों होता है आख़िर?"

न्यूटन ने माँगा उत्तर ।

क्यों कैसे कब क्या और किसका

किसको कहाँ ज़रूरी है ।

नासमझी और सच्चाई में

केवल इतनी दूरी है ।

देखो और सवाल उठाओ

सोचो क्या उत्तर होगा ।

तभी समस्याएं सुलझेंगी,

यह जीवन सुंदर होगा ।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

हुआ उजाला

बचपन में सुबह-सुबह बिस्तर पर आँखें बंद रख कर आसपास की आवाजें सुनना मुझे अच्छा लगता था । उसी अनुभव से उपजी है यह बाल-कविता ।

अंधकार की काली चादर धरती पर से सरकी
हुआ उजाला जग में, कोई बात नहीं है डर की

चीं-चीं चीं-चीं चिड़िया बोली डाली पर कीकर की
कामकाज बस शुरू हो गया सब ने खटर-पटर की

लाया है अख़बार ख़बर सब बाहर की, भीतर की
घंटी बजी, दूध मिलने में देर नहीं पल भर की

मैं सुनता रहता हूँ हर आवाज़ रसोईघर की
मम्मी के जादू से यह लो, सीटी बजी कुकर की !

बुधवार, 5 अगस्त 2009

घटती जाती दिन-दिन ताकत जेबों की

घटती जाती दिन-दिन ताकत जेबों की ।

घर पर आती नहीं टोकरी सेबों की ।

लगता है महँगाई हमसे लेगी छीन

चाकलेट, टॉफी, बिस्किट मीठे नमकीन ।

आइसक्रीम खाना भी कम हो जाएगा ।

फीका गरमी का मौसम हो जाएगा ।

नहीं खिलौने मिल पायेंगे मनचाहे ।

सपनों पर भी अंकुश होंगे अनचाहे ।

एक-एक करके होती जायेंगी बंद

वे चीज़ें जो बच्चों को हैं बड़ी पसंद ।

यही सोच कर है अपना माथा ठनका

क्या होगा भगवान हमारे बचपन का ?

मंगलवार, 12 मई 2009

शिकायत

हम भी कुछ अनजान नहीं हैं ।

"कितना भी समझा लो, लेकिन
बच्चे सुनते नहीं किसी की"--
यही शिकायत होती है ना
हम सब के पापा-मम्मी की ?

खुद कब सुनते हैं, बोलो,
क्या हम उनकी संतान नहीं हैं ?

पढने लिखने की तो हम को
देते हैं दिन-रात हिदायत ।
अगर कभी हम टी वी देखें
तो होती हैंखूब शिकायत ।

कुछ तो सोचो, भला हमारी
आँख नहीं हैं, कान नहीं हैं ?

हम भी कुछ अनजान नहीं हैं !




गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

जन्म-दिवस

अपना अगला जन्म-दिवस मैं
कुछ इस तरह मनाऊंगा
घर के आँगन के कोने में
कोई पेड़ लगाऊंगा ।

घर में जो बाई आती है
उसके घर जाऊंगा मैं
खूब मिठाई उसके बच्चों
को दे कर आऊंगा मैं ।

रंगों का डिब्बा भी दूँगा
कापी, पेंसिल, पेन, किताब ।
मेरे अगले जन्म-दिवस की
ऐसी है योजना, जनाब !

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

गरम पराठे

मम्मी, आज नाश्ते में मैं
गरम पराठे खाऊंगा ।
उसके बाद गिलास दूध का
गट-गट-गट पी जाऊंगा ।

रोज़ सवेरे जल्दी-जल्दी
होना पड़ता है तैयार ।
छह दिन तक ऐसा होता है
तब जा कर आता रविवार ।

छुट्टी के दिन तो मत रोको
हँसने और हँसाने से ।
सफल आज की छुट्टी होगी
गरम पराठे खाने से !

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

अख़बार

मैं भी अब अख़बार पढूंगा ।

साइकिल पर मैं चढ़ लेता हूँ
चित्रकथाएं पढ़ लेता हूँ
सीख गया हूँ इतनी चीज़ें
खुद कहानियाँ गढ़ लेता हूँ ।

रोज़ बदलता रहता है यह,
कैसा है संसार, पढूंगा .

दंगा बाढ़ चुनाव कहीं पर
हड़तालें घेराव कहीं पर
खेलों की है हार-जीत तो
बाज़ारों के भाव कहीं पर .

कैसे चलती है भारत की
चुनी हुई सरकार, पढूंगा .

मैं भी अब अख़बार पढूंगा .

रविवार, 29 मार्च 2009

आम

बोलो, आम किस तरह खाएँ ?


अगर चूसने लगें इन्हें तो

बह निकलेगी रस की धारा।

दाग़ लगे कपड़ों पर तो चढ़

जाता है मम्मी का पारा।


यही सोचते रहते हैं हम

कपड़ों को किस तरह बचाएँ ?


अगर काट लें चाकू से तो

शायद मुश्किल हल हो जाए।

मगर अटक जायेगी गुठली

कौन चूस कर उसको खाए ?


आम सामने हैं लेकिन हम

देख रहे हैं दायें-बाएँ।


बोलो, आम किस तरह खाएँ ?