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मंगलवार, 11 जून 2013

ग़लतफ़हमी

लड़का ट्रेन के डिब्बे में पानी की बोतलें बेच रहा था. एक साहब ने बोतल को हाथ में ले कर उसका तापमान चेक किया, फिर पैसे देते हुए पूछ लिया: "पानी खराब तो नहीं है?" लड़के ने तुरंत कहा: "आई एस आई है, साहब!" बोतल खरीद कर साहब पानी पीने लगे और लड़का आगे बढ़ गया. 

बाद में साहब ने बोतल को ध्यान से चेक किया, उन्हें शक हुआ. जब लड़का फिर से डिब्बे में आया, तो वे बोले: "तुम तो कहते थे आई एस आई है! दिखाओ, कहाँ लिखा है?"

लड़के ने जवाब दिया: "मैं तो ये बोला कि ऐसाई है साहब!"

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

मरीचिका

रेलगाड़ी अभी नहीं आयी थी । उमस बढती जा रही थी । गरमी में पसीने की चिपचिपाहट से सबके बदन भीग गए थे । कितने ही होंठ पपडाए हुए थे । लोहे की जाली वाली खिड़की के ऊपर तीन भाषाओँ में लिखा था-- 'शीतल जल' । खिड़की के सामने लोगों को पंक्तिबद्ध रखने के लिए मज़बूत पाइप लगे थे ।
पानी नहीं मिल रहा था । लोग शिकायत के लहजे में बातें कर रहे थे । एक युवक दो बार स्टेशन मास्टर के कमरे में झाँक आया था । उसने अपनी नोटबुक में से कागज़ फाडा । पानी न मिलने की शिकायत उस पर लिखी । सधे हुए क़दमों से वह शिकायत-पेटिका की ओर बढा ।
'ऊ....ई ...!' दर्द से चिल्लाते हुए युवक ने अपना हाथ शिकायत-पेटिका के जबड़ों में से वापिस खींच लिया । शिकायत वाला कागज़ नीचे गिर गया । पीली-पीली बर्रों का झुंड पेटिका में से निकल कर मँडराने लगा ।
'शीतल जल' वाली खिड़की के आगे से भीड़ छँटने लगी थी । नकली शीतल पेय बेचने वाले स्टाल पर भीड़ बढने लगी थी ।