वीतरागी हो चला था मन .
कँगूरे सामने की भीत के
जर्जर दिखाई दे रहे थे .
वनस्पतियों, पेड़-पौधों औ' लताओं
से घिरी पगडंडियों पर
हर तरफ पसरा हुआ था
निपट खालीपन .
और ही कुछ लग रहा था
सृष्टि का फैलाव
बेतरतीब बेमानी .
'सच यही है अंततः' ---
दुहरा रहा था वीतरागी मन .
'खोखली हैं ये ख़रीद-फ़रोख्त की बातें
मुलाकातें
जिन्हें हम सच समझते हैं .'
बस यही सब सोचते-गुनते
अचानक
एक पत्थर पर लिखा देखा---
'फ़ुल बॉडी मसाज'
जिसके साथ ही फिर
साफ़ देखी जा रही थी
दस अंकों वाली इक संख्या .
यूँ उकेरी गयी मानो
पा गयी अमरत्व का वरदान !
रविवार, 21 मार्च 2010
बुधवार, 17 मार्च 2010
कब्रिस्तान में सूर्योदय
कोई नियम नहीं टूटा
नहीं विच्छिन्न हुआ कोई वैधानिक प्रावधान
एक मनभावन मुस्कान तो थी
छतनार दरख्तों के होठों पर
लेकिन बारिश से वह नम हो चुकी थी
कुछ फीकी और कुछ कम हो चुकी थी .
फैलते उजास में आभास था
थमे होने का.
थोड़ी देर पहले ही
थम गयी थीं बूँदें
हवा की परतों में कैद .
हर कोई चुप था लेकिन मुस्तैद .
नामालूम रहीं सारी तैयारियाँ
कहीं कोई संकेत नहीं था
किसी उत्सव या सज्जा का .
ऐसे में उसने खिड़की से झाँका .
हुआ सब कुछ सहज ही
कोई नियम नहीं टूटा .
बस सुनहरी हुईं पेड़ों की फुनगियाँ
सरसराती हवा के साथ
धीमी गुनगुनाहट में
परिंदों की सुगबुगाहट में
किसी के लिए तो था ही उसका सन्देश
'उठ जाग, मुसाफिर, भोर भई ....'
नहीं विच्छिन्न हुआ कोई वैधानिक प्रावधान
एक मनभावन मुस्कान तो थी
छतनार दरख्तों के होठों पर
लेकिन बारिश से वह नम हो चुकी थी
कुछ फीकी और कुछ कम हो चुकी थी .
फैलते उजास में आभास था
थमे होने का.
थोड़ी देर पहले ही
थम गयी थीं बूँदें
हवा की परतों में कैद .
हर कोई चुप था लेकिन मुस्तैद .
नामालूम रहीं सारी तैयारियाँ
कहीं कोई संकेत नहीं था
किसी उत्सव या सज्जा का .
ऐसे में उसने खिड़की से झाँका .
हुआ सब कुछ सहज ही
कोई नियम नहीं टूटा .
बस सुनहरी हुईं पेड़ों की फुनगियाँ
सरसराती हवा के साथ
धीमी गुनगुनाहट में
परिंदों की सुगबुगाहट में
किसी के लिए तो था ही उसका सन्देश
'उठ जाग, मुसाफिर, भोर भई ....'
रविवार, 7 मार्च 2010
नुक्कड़ वाली तुलसी बाई
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक बाल-कविता
पैंट कमीज़ें और साड़ियाँ
ले जाती है तुलसी बाई
कपडे सभी इस्तरी करके
लौटाती है तुलसी बाई .
छोटा कद है, रंग साँवला
माथे पर बिंदी है लाल
अपने छोटे बच्चों का भी
रखती है वह खूब ख़याल .
हिम्मत से है किया सामना
जब भी कभी मुसीबत आयी .
बड़ी मेहनती नारी है यह
नुक्कड़ वाली तुलसी बाई .
पैंट कमीज़ें और साड़ियाँ
ले जाती है तुलसी बाई
कपडे सभी इस्तरी करके
लौटाती है तुलसी बाई .
छोटा कद है, रंग साँवला
माथे पर बिंदी है लाल
अपने छोटे बच्चों का भी
रखती है वह खूब ख़याल .
हिम्मत से है किया सामना
जब भी कभी मुसीबत आयी .
बड़ी मेहनती नारी है यह
नुक्कड़ वाली तुलसी बाई .
सोमवार, 1 मार्च 2010
तस्वीरों के रोग बहुत हैं...
तस्वीरों के रोग बहुत हैं .
आँखें बँधुआ बन जाती हैं,
छिन जाती मन की आज़ादी,
तय हो जाती चिंतन-धारा,
उड़ते पाखी का ऊर्ध्वंग
वेग भी सीमित हो जाता है .
सुविधा-सी लगती है शायद
इसीलिये
पक्षधर बनें जो तस्वीरों के,
जग में ऐसे लोग बहुत हैं !
तस्वीरों के रोग बहुत हैं .
शब्द ज़रा मेहनत करने से ही
सधते हैं .
लेकिन हर कल्पना
खुले में
पा सकती विस्तार शब्द से .
शब्द मुक्ति के वाहक बनते,
चिंतन के निर्झर का वेग
बढ़ाने वाले,
वस्तु-जगत के चक्रव्यूह में
हमें सुझाते नए रास्ते.
इन पर तस्वीरों के
कसने लगे शिकंजे.
तस्वीरों की बहुतायत है .
किसी संक्रमण की शुरुआत
हुई जाती है !
आँखें बँधुआ बन जाती हैं,
छिन जाती मन की आज़ादी,
तय हो जाती चिंतन-धारा,
उड़ते पाखी का ऊर्ध्वंग
वेग भी सीमित हो जाता है .
सुविधा-सी लगती है शायद
इसीलिये
पक्षधर बनें जो तस्वीरों के,
जग में ऐसे लोग बहुत हैं !
तस्वीरों के रोग बहुत हैं .
शब्द ज़रा मेहनत करने से ही
सधते हैं .
लेकिन हर कल्पना
खुले में
पा सकती विस्तार शब्द से .
शब्द मुक्ति के वाहक बनते,
चिंतन के निर्झर का वेग
बढ़ाने वाले,
वस्तु-जगत के चक्रव्यूह में
हमें सुझाते नए रास्ते.
इन पर तस्वीरों के
कसने लगे शिकंजे.
तस्वीरों की बहुतायत है .
किसी संक्रमण की शुरुआत
हुई जाती है !
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
गृहिणी
आज वैलेंटाइन डे है, सो यह प्रेम कविता गृहिणी के लिए, जिस के बारे में कवि अक्सर कुछ नहीं कहते. वह केवल हास्य-कविताओं में स्थान पाती है .
जादू की तरह मौजूद रहती है वह घर में
जादू से कम नहीं होते उसके कारनामे.
चीज़ों को जिद रहती है
टूटने की, फटने की,
बिखरने और गुम होने की.
और वह ऐसा होने नहीं देती.
चीज़ों की बेतुकी ज़िद के ख़िलाफ़
जम कर टक्कर लेती है .
जादू से कम नहीं उसका इस घर में होना
उसके होने के सबूत बार-बार देता है
इस छोटे-से घर का कोना-कोना !
जादू की तरह मौजूद रहती है वह घर में
जादू से कम नहीं होते उसके कारनामे.
चीज़ों को जिद रहती है
टूटने की, फटने की,
बिखरने और गुम होने की.
और वह ऐसा होने नहीं देती.
चीज़ों की बेतुकी ज़िद के ख़िलाफ़
जम कर टक्कर लेती है .
जादू से कम नहीं उसका इस घर में होना
उसके होने के सबूत बार-बार देता है
इस छोटे-से घर का कोना-कोना !
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
तेरी हसीं निगाह का एहसानमंद हूँ...
पहली बार एक फ़िल्मी गीत की पंक्ति आप मेरे ब्लॉग पर देख कर कुछ हैरान तो होंगे. पर बुरा ही क्या है अगर यूँ मेरी बात आप तक पहुंचे ? बात यह है कि आज मुझे आप सब के प्रति अपनी कृतज्ञता के भाव को व्यक्त करना है. जैसा अक्सर ऐसे अवसरों पर होता है, मुझे भावुकतावश कोई सही शब्द नहीं सूझ रहे हैं. मुझे याद है जब पहली बार एक उड़न तश्तरी मेरे ब्लॉग पर उतरी, या जब डॉ. रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक' के सर्व-व्यापी स्वरूप का प्रेरक साधुवाद मिला, या केवल टी वी पर देखे गए अलबेला खत्री ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी की, या घुघूती बासूती से रचनाओं के माध्यम से परिचय हुआ या परिचित-अपरिचित पाठकों की टिप्पणियां मिलने लगीं या जब देश-विदेश से अपनी रचनाओं पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं तो हर बार कृतज्ञता का यह भाव अधिकाधिक समृद्ध होता गया.
आखिर आज मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? आज के दिन में ऐसा क्या है ?
आप समझ तो गए होंगे, फिर भी बता देता हूँ . आज मुझे इस ब्लॉग 'बर्फ के खिलाफ' में लिखते हुए पूरा एक वर्ष हो गया है.
यही आशा है कि आपके ब्लोग्स पर नयी नयी पोस्ट्स पढने और अपने ब्लॉग पर नयी नयी पोस्ट्स लिखने का यह सिलसिला जारी रहेगा. चाहता था कि हर टिप्पणीकार और अनुसरण कर्ता का नाम दे कर आभार व्यक्त करूँ, पर विराम देते हुए उस फ़िल्मी गीत की दूसरी पंक्ति ही से काम चला रहा हूँ-- मैं खुशनसीब हूँ कि मैं तुमको पसंद हूँ !
आखिर आज मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? आज के दिन में ऐसा क्या है ?
आप समझ तो गए होंगे, फिर भी बता देता हूँ . आज मुझे इस ब्लॉग 'बर्फ के खिलाफ' में लिखते हुए पूरा एक वर्ष हो गया है.
यही आशा है कि आपके ब्लोग्स पर नयी नयी पोस्ट्स पढने और अपने ब्लॉग पर नयी नयी पोस्ट्स लिखने का यह सिलसिला जारी रहेगा. चाहता था कि हर टिप्पणीकार और अनुसरण कर्ता का नाम दे कर आभार व्यक्त करूँ, पर विराम देते हुए उस फ़िल्मी गीत की दूसरी पंक्ति ही से काम चला रहा हूँ-- मैं खुशनसीब हूँ कि मैं तुमको पसंद हूँ !
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
शब्दों का खेल
एक फूल के आगे फल है
दोनों मिल कर बने मिठाई .
है 'गुलाब-जामुन' वह काला
गोरे रसगुल्ले का भाई .
जो फँस जाता वह 'शिकार' है,
तैरे जल के बीच 'शिकारा' .
निकले जिस से धुन 'सितार' है,
चमके नभ के बीच 'सितारा' .
क्यों हम 'हार' नहीं पहनाते
उसको, जो चुनाव में 'हारा' ?
इस गड़बड़ घोटाले में है
यह भी एक सवाल हमारा !
दोनों मिल कर बने मिठाई .
है 'गुलाब-जामुन' वह काला
गोरे रसगुल्ले का भाई .
जो फँस जाता वह 'शिकार' है,
तैरे जल के बीच 'शिकारा' .
निकले जिस से धुन 'सितार' है,
चमके नभ के बीच 'सितारा' .
क्यों हम 'हार' नहीं पहनाते
उसको, जो चुनाव में 'हारा' ?
इस गड़बड़ घोटाले में है
यह भी एक सवाल हमारा !
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